उत्तराखंड

दिग्गजों की खींचतान से जूझ रही कांग्रेस के लिए उत्तराखंड में राहुल उतने ही जरूरी, जितने BJP के लिए नरेन्द्र मोदी

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु और फिर गांधी परिवार के उत्तराखंड से गहरे रिश्ते रहे हैं। प्रदेश से यही नाता राहुल गांधी को पार्टी के लिए उतना आवश्यक बना देता है, जितना भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। लोकसभा चुनाव में राहुल एक बार फिर मुख्य स्टार प्रचारक की भूमिका में होंगे। साथ में निजी महत्वाकांक्षा को लेकर एकदूसरे से टकराते दिग्गजों को एकजुट करना पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए भी संभव हो पाता है।

अंतर्कलह और गुटों में बंटी पार्टी राहुल के पीछे ही लामबंद हो पाती है। कुल मिलाकर पार्टी के लिए नायक बने राहुल चुनावी मौसम में पार्टी के लिए असरकारक साबित नहीं हो रहे हैं। पिछले दो लोकसभा चुनाव के परिणाम इसकी गवाही देते हैं। भाजपा अब तक पांच में से तीन सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है, जबकि कांग्रेस अब तक यह कार्य नहीं कर पाई।

भाजपा के पास मोदी और उत्तराखंड में महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के रूप में मोदी का काम है, वहीं कांग्रेस के पास मात्र राहुल और उत्तराखंड से उनके भावनात्मक रिश्ते हैं। अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यहां लोकसभा चुनाव का यह पांचवां महा मुकाबला है।

प्रदेश में लोकसभा की भले ही पांच सीटों पर चुनाव होने हैं, लेकिन इस चुनावी समर में पार्टी की नैया को पार लगाने का बड़ा दायित्व कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के कंधों पर ही रहने जा रहा है।

मोदी मैजिक के रथ पर सवार भाजपा को मुख्य चुनौती राहुल गांधी से ही मिलनी है। राहुल अपने परिवार और स्वयं के उत्तराखंड विशेष रूप से देहरादून से भावनात्मक रिश्ते का उल्लेख करने का अवसर नहीं छोड़ते। मोदी की काट के लिए इस हथियार का उपयोग इस बार भी तय माना जा रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले देहरादून जेल में रह चुके हैं।

जेल में रहते हुए पुत्री इंदिरा को लिखे गए पत्र अब ऐतिहासिक धरोहर बन चुके हैं। यही नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी यहां अपने दौरे के वक्त पहनावे में पर्वतीय संस्कृति से स्वयं को जोड़कर उत्तराखंड से अपने मजबूत संबंधों को नई ऊर्जा देती रहीं थीं। राहुल गांधी ने प्रतिष्ठित दून स्कूल में शिक्षा ग्रहण की है। उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के बच्चे भी यहां पढ़े हैं। अपने इस रिश्ते का चुनाव प्रचार के दौरान जिक्र करना राहुल गांधी नहीं भूलते।

प्रदेश से जुड़ाव के साथ बाबा केदारनाथ के प्रति आस्था जताने में भी राहुल गांधी पीछे नहीं रहे। अब तक दो बार केदारनाथ धाम की यात्रा कर चुके हैं। वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान राहुल प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचे थे। आपदा के बाद हालात कुछ संभले तो वर्ष 2014 में राहुल गांधी ने केदारनाथ धाम की पैदल यात्रा कर चारधाम यात्रा को लेकर देश-विदेश को संदेश दिया। गत वर्ष नवंबर में भी राहुल तीन दिवसीय यात्रा पर केदारनाथ धाम पहुंचे थे।

बाबा के केदार के दर्शनों के लिए राहुल श्रद्धालुओं के साथ कतार में भी खड़े रहे। उन्होंने श्रद्धालुओं को चाय बांटी, लंगर में भोजन प्रसाद खिलाया था। प्रांतीय नेताओं के अंतर्कलह सुलझाने में रहे सफल राहुल की बड़ी भूमिका प्रदेश में पार्टी को अंतर्कलह से बचाने में भी सामने आई है। प्रदेश में पार्टी के बड़े नेताओं के बीच जब भी तलवारें खिंची और संकट की स्थिति उत्पन्न हुई, राहुल गांधी की मध्यस्थता के बाद ही हालात सुलझ पाए हैं।

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद अब तक कई बार ऐसे अवसर आए, जब विधायकों ने खुलकर पार्टी के निर्णयों की आलोचना की। बाद में राहुल दरबार में ही विवादों का समाधान हो सका। वर्तमान में भी लोकसभा सीट पर प्रत्याशियों के चयन, टिकट की दावेदारी को लेकर बड़े नेताओं के मतभेद खुलकर सामने आए हैं। माना जा रहा है कि राहुल गांधी की अध्यक्षता में केंद्रीय चुनाव समिति की होने वाली बैठक में नेताओं के मतभेद दूर कर प्रत्याशियों को लेकर स्थिति साफ हो सकेगी।

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