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उत्तराखंड के दो सरकारी विभाग, क्यों हो रहे है एक अधिकारी पर मेहरबान

देहरादून: उत्तराखंड में प्रतिनियुक्तियां विभागों के लिए मुसीबत बन गयी है. मूल विभाग में कर्मियों की कमी के बावजूद ऊंची पहुंच के चलते दूसरे विभागों में तैनातियां की जा रही हैं. सरकारी आदेश और नियमों की खिल्ली उड़ाने वाला एक ऐसा ही मामला वन विभाग से भी सामने आया है. जहां वन क्षेत्राधिकारी को प्रतिनियुक्ति देने के लिए दो महकमे मेहरबान दिखाई दे रहे हैं.

उत्तराखंड में ऐसे कई मामले हैं, जहां अधिकारी-कर्मचारी अपने मूल विभाग में वापस आना ही नहीं चाहते. हालांकि, इसके पीछे कई वजह बताई जाती हैं. लेकिन चिंता तब बढ़ जाती है. जब आदेशों के विपरीत कर्मियों को प्रतिनियुक्ति पर बनाए रखने के लिए विभाग भी मदद करने लगते हैं. ताजा मामला उत्तराखंड वन महकमे में वन क्षेत्राधिकारी महेंद्र सिंह यादव का है.

यूं तो महेंद्र यादव की नियुक्ति वन महकमे में वन क्षेत्राधिकारी पद पर हुई है लेकिन प्रतिनियुक्ति के आधार पर महेंद्र यादव को ग्राम्य विकास समिति के अंतर्गत एकीकृत आजीविका सहयोग परियोजना में तैनाती दी गयी है. दस्तावेज बताते हैं कि महेंद्र यादव को 31 जनवरी 2014 को वन विभाग से ग्राम्य विकास विभाग के लिए प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया. जो अब तक 5 साल बीतने के बावजूद भी जारी है.

खास बात यह है कि इस दौरान महेंद्र यादव की वन विभाग में पदोन्नति करते हुए उन्हें उपवन क्षेत्राधिकारी से वन क्षेत्राधिकारी बना दिया गया लेकिन महेंद्र यादव का मूल विभाग की जगह ग्राम्य विकास विभाग ही चहेता बना रहा, जबकि 12 मार्च 2007 में सचिव डीके कोटिया के आदेश के अनुसार किसी भी सरकारी कर्मी को 5 साल से अधिक प्रतिनियुक्ति नहीं दी जा सकती है. आदेश की कॉपी से पता चलता है कि किस तरह प्रतिनियुक्ति को लेकर दिए गए आदेशों की धज्जियां उड़ाई गई है, यही नहीं प्रमोशन के बाद महेंद्र यादव को मूल विभाग में नियुक्ति देने की दी गई समय सीमा तक उनके द्वारा निश्चित जगह पर तैनाती नही दी गयी.

मामले को लेकर विभाग के अधिकारियों से भी ईटीवी भारत की टीम ने संपर्क साधा लेकिन कोई भी मामले पर बोलने को तैयार नही दिखा. उधर, वन मंत्री हरक सिंह रावत कहते हैं कि विभाग में अधिकारियों की कमी है और वे अब जल्द ही प्रतिनियुक्ति पर गए कर्मियों को वापस बुलाने का आदेश करने जा रहे हैं.

क्या कहते हैं प्रतिनियुक्ति के नियम ?

  • प्रतिनियुक्ति को लेकर नियमानुसार प्रशासकीय विभाग किसी भी अधिकारी को बाह्य सेवा में 3 साल के लिए भेज सकता है, जबकि विशेष परिस्थितियों में वित्त विभाग की सहमति से इसे 2 साल के लिए बढ़ाया जा सकता है यानी प्रतिनियुक्ति की अधिकतम सीमा 5 साल तक ही रखी जा सकती है.
  • किसी भी अधिकारी को प्रतिनियुक्ति की समय सीमा खत्म करने के बाद अपने मूल विभाग में कम से कम 6 महीने तक तैनाती देनी होगी, उसके बाद ही दोबारा प्रतिनियुक्ति पर संबंधित अधिकारी जा सकेगा.
  • प्रतिनियुक्ति की समय सीमा खत्म होने के बाद अधिकारी को फौरन अपने मूल विभाग में नियुक्ति देना जरूरी होगा.
  • प्रतिनियुक्ति का समय खत्म होने के बाद भी अगर कर्मी अपनी मूल तैनाती पर नहीं आता है तो उसके खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई के भी सख्त नियम हैं

महेंद्र सिंह यादव के मामले में उठने वाले सवाल

  • महेंद्र सिंह यादव की प्रतिनियुक्ति आदेश 31 जनवरी 2014 को हुए, जिसे 5 साल के लिहाज से 31 जनवरी 2019 को पूरा हो जाना चाहिए था. फिर कैसे महेंद्र यादव प्रतिनियुक्ति पर बने हुए हैं ?
  • मूल विभाग में वापस जाए बिना वन विभाग ने कैसे 5 साल के बाद सीधे प्रतिनियुक्ति का समय बढ़ा दिया.
  • महेंद्र सिंह यादव का वन क्षेत्राधिकारी के रूप में प्रमोशन होने के बाद 31 जून 2018 तक तैनाती सूचना देने के आदेश के बाद क्या संबंधित अधिकारी ने विभाग को प्रतिनियुक्ति को लेकर सूचना दी. अगर नहीं तो विभाग ने महेंद्र यादव पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की ?
  • महेंद्र सिंह यादव को क्या ग्रामीण विकास समिति में वन क्षेत्राधिकारी के समानांतर पद पर तैनाती दी गई है. अगर नहीं तो इसके बावजूद भी महेंद्र सिंह यादव कैसे प्रतिनियुक्ति के लिए तैयार हो गए ?

यहां, सवाल ये उठता है कि अगर डीएम 5 साल तक प्रति व्यक्ति देने का है. तो इससे इतर क्यों विभाग अधिकारी पर मेहरबान बना हुआ है. इससे न केवल संबंधित अधिकारी को लेकर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि मेहरबानी करने वाले दोनों विभागों के अधिकारियों पर भी सवाल उठना लाजमी है. जरूरत है कि विभाग मामले में जांच के बाद स्थिति को स्पष्ट करें ताकि प्रतिनियुक्ति पर उठने वाले सवालों के विभाग जवाब दे सके.

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