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देश किसे नागरिकता दे और किसे नहीं

 नागरिकता (संशोधन) विधेयक लोकसभा से पारित हो गया है। अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा, जहां सरकार की असल परीक्षा होगी। गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के विरोध के बीच कहा, ‘विधेयक अल्पसंख्यकों की बजाय घुसपैठियों के खिलाफ है।

यह संविधान के किसी भी अनुच्छेद की अवज्ञा नहीं करता है। ना ही यह धर्म के परिप्रेक्ष्य में भेदभाव करता है। देश के मुसलमानों के कोई अधिकार छीनने की कोशिश इस कानून के जरिये नहीं की गई है।’गृह मंत्री ने कांग्रेस को इस मामले पर जवाब देते हुए कहा, ‘धर्म के आधार पर देश का विभाजन तो कांग्रेस ने किया था।

इस विभाजन को खत्म करने के लिए 130 करोड़ लोगों के हित संरक्षण के लिए यह विधेयक लाया गया है।’ मालूम हो कि यह कानून असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा और मणिपुर के आदिवासी इलाकों में लागू नहीं होगा। लोक-संपदा व संस्कृति के संरक्षण के लिए मणिपुर को ईनर लाइन परमिट में शामिल किया गया है।

इसके बावजूद विधेयक के विरोध में पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में जबरदस्त आक्रोश दिखाई दे रहा है जिसके लिए वहां के निहित स्वार्थी तत्व जिम्मेदार हैं।

यह विधेयक नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों को बदलने के लिए पेश किया गया है। इसमें अनेक नए प्राविधान किए गए हैं। दरअसल विपक्षी दल धर्म और पंथनिरपेक्ष आधार पर भेदभाव के रूप में नागरिकता विधेयक की आलोचना कर रहे हैं। इसमें श्रीलंका और नेपाल के घुसपैठिये मुस्लिमों को भी शामिल करने की मांग उठ रही है।

खासतौर से कांग्रेस के नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 1971 में जब इंदिरा गांधी के प्रयास से बांग्लादेश वजूद में आया था, तब बांग्लादेश से आए लोगों को तो नागरिकता दी गई थी, लेकिन पाकिस्तान से आए लोगों को नहीं दी गई थी। लिहाजा देश किसे नागरिकता दे और किसे नहीं दे, यह संविधान सम्मत है।

इस नाते समानता का सिद्धांत उन्हीं पर लागू हो सकता है, जिन्हें भारतीय नागरिकता दी गई है। यह अधिकार केंद्र सरकार के पास सुरक्षित है कि वह किसे शरण दे और किसे भारतीय नागरिकता प्रदान करे। गोया, इस विधेयक पर वोट या तुष्टिकरण की राजनीति करना देशहित में कतई नहीं है।

दरअसल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान ऐसे मुस्लिम बहुल देश हैं, जिनमें गैर-मुस्लिम नागरिकों पर अत्याचार और महिलाओं के साथ दुष्कर्म किए जाते हैं। चूंकि ये देश एक समय अखंड भारत का हिस्सा थे, इसलिए इन तीनों देशों में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी बड़ी संख्या में रहते थे। वर्ष 1947 में जब भारत से अलग होकर पाकिस्तान नया देश बना था, तब वहां लगभग 20 प्रतिशत गैर-मुस्लिमों की आबादी थी, जो अब घटकर दो प्रतिशत रह गई है।

पाकिस्तान से अलग होकर जब बांग्लादेश वजूद में आया था, तब वहां बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे मुक्ति संग्राम के जवानों ने गैर-मुस्लिम स्त्री व पुरुषों के साथ ऐसे दुराचार व अत्याचार किए कि वे भारत की ओर पलायन करने को मजबूर हुए।

बांग्लादेश के समाजशास्त्री इस्माइल सादिक, रॉबिन डिसूजा व पुरंदर देवरॉय बहुत पहले लिख चुके हैं कि ‘वहां के समाज का बड़ा हिस्सा धार्मिक अल्पसंख्यकों की आजादी को पसंद नहीं करता है। इन समुदायों के पर्व- त्योहारों पर वह इसलिए आक्रामक हो उठता है, ताकि वे अपने पर्वों को मनाने से डरें।’

अफगानिस्तान के आतंकवादियों ने इस सदी के आरंभ में बामियान में बड़े-बड़े पहाड़ी चट्टानों को तराशकर बनाई गई भगवान बुद्ध की मूर्तियों को तोप के गोलों से केवल इसलिए उड़ा दिया था, क्योंकि वे इतर धर्म से संबंध रखती थीं।

इससे पता चलता है कि इन देशों में बहुसंख्यक धर्मावलंबी दूसरे धार्मिक समुदायों को पसंद नहीं करते हैं। इस मानसिकता के चलते ही इन देशों में यदि कोई उदार मुस्लिम नेता अथवा सामाजिक कार्यकर्ता गैर-मुस्लिमों के प्रति थोड़ी-बहुत भी सहानुभूति जताता है तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है।

इन्हीं समस्याओं से छुटकारा पाने की दृष्टि से गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में घोषणा की है कि ‘पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) लागू करेंगे।’

गृह मंत्री की यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार से बड़ी संख्या में मुस्लिम घुसपैठियों ने आकर देश में आजीविका के संसाधनों पर तो कब्जा कर लिया है। साथ ही देश के जनसंख्यात्मक घनत्व को बिगाड़ा है और पूर्वोत्तर राज्यों में मूल निवासियों के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं।

असम में कुछ समय पहले जारी एनआरसी सूची के बाद बवाल मचा हुआ है, क्योंकि यहां 19.6 लाख लोगों के नाम एनआरसी की अंतिम सूची में नहीं आए। नतीजन अब इन्हें अपनी अपील पर न्यायाधिकरण द्वारा सुनवाई किए जाने का इंतजार है। दरअसल असम में स्थानीय बनाम विदेशी नागरिकों का मसला राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को लंबे समय से झकझोर रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि विधेयक को लेकर सरकार के सामने पूर्वोत्तर भारत बड़ी चुनौती के रूप में पेश आ सकता है। क्योंकि इसके लोकसभा से पारित होने के साथ ही असम सहित पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों व पश्चिम बंगाल में विरोध शुरू हो गया है।

इस विधेयक का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं का कहना है कि सरकार ने उन्हें भरोसे में नहीं लिया। दरअसल भाजपा और असम गण परिषद को छोड़ यहां ज्यादातर राजनीतिक दल कांग्रेस और माक्र्सवादी विचारधारा के प्रभाव में हैं।

गोया, भाजपा जानती थी कि इनसे बातचीत का कोई अनुकूल अर्थ निकलने वाला नहीं था? ये दल यह भी कह रहे हैं कि इस विधेयक के जरिये भाजपा हिंदू वोट बैंक इस क्षेत्र में मजबूत करना चाहती है। लेकिन समझा जा रहा है कि भाजपा की मंशा यह है कि एनआरसी में जो 19 लाख से ज्यादा लोग छूट गए हैं, उनमें 12 लाख बंगाली हिंदू हैं।

इस विधेयक के पारित होने के बाद ये भारतीय नागरिक बन जाएंगे। इससे शरणार्थी और अवैध प्रवासियों की स्थिति में बदलाव आएगा।

नागरिकता (संशोधन) विधेयक के कानूनी रूप में आ जाने के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के प्रवासियों के लिए भारतीय नागरिकता प्राप्त करना आसान होगा।

इसमें प्रवासी मुस्लिमों को नागरिकता देने का प्रावधान इसलिए नहीं किया गया है, क्योंकि उनमें से अधिकांश भारत में घुसपैठियों के रूप में आसान आजीविका के संसाधन प्राप्त करने के लिए आए हैं। जबकि अन्य धर्मावलंबियों को अल्पसंख्यक होने के कारण प्रताड़ित कर पलायन को मजबूर किया गया। ऐसे में इन तीनों देशों के मुस्लिम प्रवासियों को इस व्यवस्था से वंचित रखना अनुचित नहीं कहा जा सकता है।

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