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जल संसाधन विभाग ने फजी बिल का 877 करोड़ का भुगतान किया

भोपाल. कमलनाथ सरकार के दौरान जल संसाधन विभाग में हुए घोटाले पर EOW ने केस दर्ज कर लिया है. ये मामला काम शुरू होने से पहले ही करोड़ों के एडवांस भुगतान का है. 7 बांध और नहर परियोजना का काम शुरू होने से पहले ही फर्जी बिल के आधार पर ठेकेदारों को 877 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया था. शिवराज सरकार ने उस घोटाले के खिलाफ फाइल खोल दी है. तत्कालीन जल संसाधन मंत्री हुकुम सिंह कराड़ा भी जांच के दायरे में हैं.

EOW में प्रकरण दर्ज होने के बाद तत्कालीन अफसरों की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गयी है. गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने तत्कालीन कमलनाथ सरकार पर हमला बोला है. उन्होंने कहा- जल संसाधन विभाग के तीन अफसरों पर EOW कार्रवाई करेगी. कमलनाथ सरकार में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी की जांच हो रही है. पूरे मामले में केस रजिस्टर कर जांच की जा रही है.

क्या है मामला
जल संसाधन विभाग के तीन अफसरों की बड़ी करतूत का खुलासा हुआ है. इन अफसरों ने 3300 करोड़ रु. के 7 बांध और नहर परियोजनाओं का काम शुरू होने के पहले ही ठेकेदारों को 877 करोड़ रु. का एडवांस पेमेंट कर दिया था. इन अफसरों में विभाग के तत्कालीन प्रमुख अभियंता राजीव सुकलीकर, अधीक्षण यंत्री शरद श्रीवास्तव और मुख्य अभियंता शिरीष मिश्रा शामिल हैं. शिकायत होने पर सरकार ने जून 2021 में यह केस आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) को सौंपा था. गुरुवार को EOW ने तीनों अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी का केस दर्ज किया है. सुकलीकर जल संसाधन विभाग से रिटायर होकर अभी नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण में सदस्य हैं. जबकि शरद और शिरीष भोपाल मुख्यालय में पदस्थ हैं.

877 करोड़ रु. का पेमेंट
प्रदेश में सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने के लिए बैतूल, दमोह, सागर और सिंगरौली में बांध और नहर बनाने की 7 योजनाएं साल 2019 में मंजूर हुई थीं. अफसरों ने भ्रष्टाचार की नीयत से मई 2019 में ठेकों की शर्तें मनमानी करके से हटा दीं और ठेकेदारों को काम शुरू होने के पहले ही 877 करोड़ रु. का पेमेंट कर दिया. हनोता, बंडा और गौंड बांध के ठेकेदारों को 495 करोड़ रुपये और शेष चार बांधों के ठेकेदारों को 382 करोड़ रुपए दिए गए. विभागीय जांच में पाया गया कि मौके पर एक प्रतिशत काम भी शुरू नहीं हुआ था. फिलहाल मामले में जांच के बाद विभाग के ही कुछ अन्य अफसरों और ठेकेदारों को भी आरोपी बनाया जाएगा.

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