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खेत में जैविक खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं पवन ढेला

उत्तराखंड में नैनीताल जिला से 70 किलोमीटर दूर मजीरा गाँव के पवन ढेला पिछले 9 सालों से जैविक खेती कर रहे हैं। उनके पास एक एकड़ से भी कम ज़मीन है लेकिन उसमें भी वह मौसमी सब्ज़ियाँ, फल और खाद्यान्न उगा रहे हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि उन्होंने खेती के लिए अपनी नौकरी नहीं छोड़ी है। उनका उद्देश्य अपने आस-पास के युवाओं को पढ़ाई के साथ खेती से जुड़ने के लिए प्रेरित करना है। उनका मानना है कि अगर आज पहाड़ों के युवा आगे नहीं आए तो आने वाली पीढ़ी का पहाड़ों में कोई अस्तित्व नहीं बचेगा।

पवन ने द बेटर इंडिया को बताया, “मुझे भी ग्रैजुएशन के दिनों में बाहर शहर में जाकर नौकरी करने और रहने का चाव था। सामाजिक संगठनों के साथ काम करते हुए कुछ साल बाहर रहा भी। अपने यहाँ वापस लौटने से पहले मैं अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन के साथ काम कर रहा था। वहां अगर आज मैं होता तो शायद बहुत अच्छी पोस्ट पर होता लेकिन तब मैं अपने लोगों के लिए कुछ नहीं कर पाता।”

पवन ने अपने पिता को काफी पहले खो दिया था और घर में तब उनकी माँ और दो बहन थी। बहनों की शादी के बाद माँ ही खेती संभालती थीं और पवन नौकरी के लिए चंडीगढ़ में रहते थे। उन्होंने सोचा तो यही था कि वह चंडीगढ़ में ही सेटल हो जाएंगे। लेकिन लगभग 9-10 साल पहले वह हमेशा के लिए अपने घर लौट आए।

वह कहते हैं कि उनकी माँ को अकेले यहाँ पर सब संभालना पड़ रहा था और उनकी मदद की भावना से वह कुछ दिनों के लिए घर आए। लेकिन तब उन्हें यह नहीं पता था कि वह यहीं के होकर रह जाएंगे। उन्होंने खेती में अपनी माँ की मदद करना शुरू किया और देखा कि इतनी मेहनत के बावजूद उनके यहाँ दो ही फसलें हो पाती हैं।

“मैंने सामाजिक संगठनों के साथ काम किया था तो कृषि के क्षेत्र में भी मेरा ज्ञान थोड़ा बढ़ा था। इसलिए मैंने जैविक खेती के साथ-साथ मल्टी-क्रॉपिंग, रिले-क्रॉपिंग और कुछ एक्सोटिक सब्ज़ियाँ उगाने का सोचा। क्योंकि अगर हम पारंपरिक ढर्रे से चलते रहें तो कृषि में सफलता मिलना मुश्किल है। कृषि को भी आधुनिक तकनीकों की तरह हमें आधुनिक बनाना होगा,” उन्होंने बताया।

पवन ने अपनी शुरूआत मौसमी सब्ज़ियाँ जैसे पत्ता-गोभी, टमाटर, पालक, मेथी, मिर्च आदि से की और इसके साथ कुछ विदेशी सब्ज़ियाँ जैसे लेटिश, चेरी टमाटर आदि भी लगाई। इसके अलावा, खरीफ में वह दाल, रागी की फसलें लगाते हैं। उनके फार्म में लगभग 150 फलों के पेड़ भी हैं जिनमें आडू, अंजीर, सेब आदि शामिल हैं।

जैसे-जैसे पवन जैविक खेती और आधुनिक तरीकों को समझने लगे, उनकी रूचि इसमें बढ़ती ही गई। बाहर जाकर रहने का ख्याल उनके दिलो-दिमाग से कब चला गया, उन्हें पता भी नहीं चला। वह कहते हैं कि अगर इंसान चाहे तो अपनी जगह पर रहकर भी अपने रास्ते बना सकता है। वह नौकरी करना चाहते थे लेकिन उन्होंने इसके विकल्प अपने आस-पास ही तलाशे।

“अब मैं अपने परिवार के पास रह सकता हूँ और अपनी खेती को खुद संभाल सकता हूँ। इससे मुझे कुछ भी छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। बस हमें समझना होगा कि बाहर बड़े शहरों में रहना ही सफलता नहीं है बल्कि आप सफल तब होते हैं जब आपका जीवन हर तरफ से परिपूर्ण हो,” उन्होंने बताया।

पवन ने जब नौकरी की तलाश शुरू की तो उन्हें पता चला कि बहुत से संगठन हैं जो उत्तराखंड में काम कर रहे हैं। उन्होंने भी एक संगठन में अप्लाई किया और किस्मत की बात यह थी कि यह संगठन कृषि के क्षेत्र में ही काम कर रहा है। इस संगठन से जुड़कर पवन ने खुद तो बहुत कुछ सीखा ही बल्कि स्थानीय होने की वजह से वह पहाड़ के लोगों के जीवन में भी काफी सुधार कर पाए हैं।

अक्सर लोगों को लगता है कि नौकरी के साथ खेती-बाड़ी कैसे होगी। लेकिन पवन कहते हैं कि अगर आपका पूरा परिवार ज़िम्मेदारी से काम करे तो यह बिल्कुल भी नामुमकिन नहीं। वह सुबह डेढ़ से दो घंटे खेतों में काम करते हैं और उनके जाने के बाद, उनकी माँ और पत्नी बाकी काम संभाल लेती हैं। इसके बाद, छुट्टी वाले दिन का मतलब होता है खेतों की देखभाल।

“हमने एक प्रोसेसिंग यूनिट भी सेट-अप की हुई है। जहां बहुत सी महिलाएं काम करने आती हैं। मैं यहाँ पर स्थानीय हूँ और खुद भी खेती करता हूँ। इसलिए पहाड़ों के किसानों तक पहुँचना आसान है। संगठन के ज़रिए हम बहुत से किसानों की मदद करने में सफल रहे हैं और उम्मीद है कि आगे हम अपने इलाके के सभी गांवों में लोगों को कृषि और प्रोसेसिंग से जोड़ पाएं,” उन्होंने कहा।

पवन की प्रेरणा से उनके आस-पास के कुछ और किसान जैविक खेती की तरफ बढ़ रहे हैं। आगे उनकी योजना इन किसानों के साथ मिलकर एक किसान उत्पादक संगठन बनाने की है। फ़िलहाल, उनकी ज़मीन से इतना उत्पादन नहीं हो पाता कि वह अपने स्तर पर प्रोसेसिंग कर बाज़ार तक अपने प्रोडक्ट्स भेजें। लेकिन उनकी कोशिश है कि वह दूसरे किसानों को जोड़कर एक ब्रांड बनाएं ताकि उनके इलाके के किसानों की फसल पूरे देश में पहुंचे।

तब तक के लिए पवन सिर्फ यही कहते हैं, “पहाड़ों के लोग सोच रहे हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिख जाएंगे तो उनका भविष्य संवर जाएगा। लेकिन अगर उनकी जड़ें ही कट जाएंगी तो कैसा भविष्य। आप अपने बच्चों को पढ़ाएं-लिखायें लेकिन उन्हें उनकी जड़ों और उनके पहाड़ों से भी जोड़कर रखें ताकि कल को वे अपनी परम्पराओं को आगे बढ़ाएं और बाहर जाने की बजाय पहाड़ों में रोज़गार के अवसर तलाशें।”

अगर आप पवन ढेला से संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें 8954125030 पर मैसेज कर सकते हैं!

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