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उत्तराखंड में हिमाचल से तीन गुना अधिक हुआ शहरीकरण

इसमें कोई शंका नहीं कि उत्तराखंड में राज्य गठन के बाद शहरीकरण बेहद तेज गति से बढ़ा है। हालांकि, इसके मुकाबले संसाधन बेहतर नहीं हो पाए। राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में भी शहरीकरण के मुताबिक संसाधन विकसित करने की ठोस कार्ययोजना नहीं रही। लिहाजा, सोशल डेवलपमेंट फार कम्युनिटीज (एसडीसी) फाउंडेशन ने देशभर में शहरीकरण के आंकड़े जारी करते हुए राजनीतिक दलों से शहरीकरण को चुनावी घोषणा पत्र में उपयुक्त जगह देने की मांग उठाई है।

शहरीकरण के आंकड़े (वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक) जारी करते हुए एसडीसी फाउंडेशन के अध्यक्ष अनूप नौटियाल ने कहा कि समान भौगोलिक परिस्थिति वाले हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में शहरीकरण की रफ्तार में तीन गुना का अंतर है। हिमाचल प्रदेश में शहरीकरण 10 प्रतिशत है तो उत्तराखंड में 30.6 प्रतिशत। उत्तर प्रदेश (22.3 प्रतिशत) तक शहरीकरण में उत्तराखंड से पीछे दिख रहा है।

अनूप नौटियाल ने कहा कि चारधाम राजमार्ग परियोजना, कर्णप्रयाग रेल लाइन समेत इकोनोमिक कारीडोर (दिल्ली-दून राजमार्ग) जैसी परियोजनाओं से शहरीकरण की रफ्तार और तेज होगी। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, मगर इसके अनुरूप संसाधन विकसित न होने से आने वाले वर्षों में व्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा है। दून आबादी के दबाव से जूझ रहा है। पेयजल, सीवरेज, सड़क, कूड़ा प्रबंधन के इंतजाम बौने साबित होने लगे हैं।

अब नई समस्या आवास की सुलभता को लेकर खड़ी होने लगी है। नदी-नालों पर तेजी से कब्जे हो रहे हैं। नई कालोनियां नियोजित ढंग से नहीं बसाई जा रहीं। दूरस्थ कस्बे भी शहरीकरण के दबाव में परेशानी झेल रहे हैं। लिहाजा, राजनीतिक दलों को दूरदृष्टि दिखाते हुए सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट से आगे बढ़ते हुए अर्बन रेजीडेंशियल प्लान, सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल, वेस्ट मैनेजमेंट, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सिटी क्लाइमेट चेंज जैसे गंभीर मुद्दों पर फोकस करना होगा।

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