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पलायन की मजबूरी, रोजगार पलायन का ‘कारण’ भी है और ‘हल’ भी

पलायन की मजबूरी क्या थी?

सच यह है कि पहाड़ में कृषि कर्म इतना ही सहज होता तो जो लोग आज अपने घर गांवों को लौट रहे हैं, वे पहाड़ से पलायन ही क्यों करते ? ऐसा भी तो नहीं है कि हमारी सरकारों ने बीते बीस वर्षों में कोई ऐसा चमत्कार कर दिया हो जिससे पहाड़ में खेती की राह आसान हो गयी हो। उल्टा पिछले कुछ सालों में तो जो अच्छे-खासे खेत सरसब्ज थे वो भी बंजर हो चले हैं, पलायन और तेजी से बढ़ा है ।

दरअसल पहाड़ में जिस पलायन को लेकर चिंता है वह स्वैच्छिक नहीं बल्कि मजबूरी का पलायन है। गरीबी और बेरोजगारी का पलायन है। राज्य में 57 फीसदी परिवार ऐसे हैं, जिनके सदस्य हर साल रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं। बीते दस सालों में ही तकरीबन चार लाख लोगों ने अस्थायी और लगभग सवा लाख लोगों ने स्थायी रूप से पहाड़ से पलायन किया।

पलायन के आंकड़े बताते हैं कि तकरीबन 41 फीसदी पलायन गरीबी और 16 फीसदी पलायन बेरोजगारी का है। पलायन कर राज्य से बाहर जाने वालों का राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है। यही कारण है कि सरकार का जो आयोग पलायन पर चिंता कर रहा था, अब उसकी चिंता यह है कि बड़ी आबादी के अपने घर-गांव लौटने के चलते पहाड़ी जिलों की जीडीपी में गिरावट आ जाएगी।