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जापानी तकनीक ‘मियावाकी’ से लहलहा उठा रानीखेत का कालिका वन रेंज का जंगल

अल्मोड़ा: पहाड़ में खोखले होते जा रहे वन क्षेत्र बहुत जल्द हरियाली से निखर उठेंगे। इस भगीरथ प्रयास में जुटे वन अनुसंधान केंद्र कालिका (रानीखेत) के शोधार्थियों की मेहनत धरातल पर विस्तार लेने लगी है। यहां जापानी तकनीक ‘मियावाकी’ से जंगल तैयार करने का अभिनव प्रयोग सफल हो गया है। यहां चीड़ के पेड़ों के बीच खाली पड़े जंगलात में 2.5 हेक्टेयर में स्थानीय वनस्पति प्रजातियों की 3300 से ज्यादा पौध लहलहाने लगे हैं। इससे उत्साहित शोधार्थी व वन कर्मियों ने बरसात में .75 हेक्टेयर को हराभरा बनाने की तैयारी कर ली है।

दरअसल, रानीखेत के कालिका वन रेंज में वर्ष 2018 में .25 हेक्टेयर में स्थानीय बहुपयोगी प्रजातियों का जंगलात तैयार करने का काम शुरू हुआ। प्रयोग के तौर पर बीते वर्ष 3339 पौधे लगाए गए। इनमें झाड़ी व वृक्षों की 37 प्रजातिया हैं। खास बात कि सभी ने जड़ें जमा ली हैं और बढ़वार भी बेहतर है। कुमाऊं में वन विभाग का रानीखेत के कालिका में जापानी तकनीक से तैयार किया गया यह पहला जंगल है।

12 हजार नए पौधों से होगा श्रृंगार

वन अनुसंधान केंद्र कालिका के पर्यावरण प्रेमी अब बरसात में नई जमीन पर नए पौधे लगाने की तैयारी में जुट गए हैं। वनाग्नि के जनक चीड़ के जंगल में खाली पड़ी भूमि पर .75 हेक्टेयर क्षेत्र को पौधरोपण के लिए तैयार कर लिया गया है। यहां स्थानीय वनस्पति प्रजातियों के 12 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य है।

क्या है मियावाकी तकनीक

माना जाता है कि जापान के पर्यावरणविद् डॉ. मियावाकी ने करीब 40 वर्ष यह तकनीक तैयार की। इसकी खासियत यह है कि संबंधित जमीन पर वहीं की स्थानीय वनस्पति प्रजातियों को बढ़ावा दिया जाता है। ताकि माकूल आबोहवा, जलवायु, मौसम व मृदा इन पौधों के विकास में मददगार बन सकें। इसमें बढ़वार जहां तेजी से होती है वहीं पौधों के मरने की आशंका बिल्कुल नहीं रहती। यानी जितने पौधे लगाएंगे सभी लगभग जिंदा रहते हैं। इस तकनीक के तहत पहले गड्ढे खोदकर कुछ महीने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। फिर उसमें दालों, गोबर व भूसे से बनी जैविक खाद देकर पौधे लगाए जाते हैं।

तीन प्रक्रियाओं से गुजरती है तकनीक

पहला सामान्य प्रक्रिया मसलन जनवरी व फरवरी में गढ्डे खोदकर छोड़ देना, फिर बरसात में पौधरोपण

दूसरा, पौधों को जैविक तकनीक से गोमूत्र, गोबर, चना दाल, दीमक वाली मिट्टी, गुड़, आदि से बने जीवामृत ( जैविक खाद का तरल रूप) में डुबा कर पौधरोपण।

तीसरे में पौधरोपण कर जीवामृत का छिड़काव ताकि बढ़वार बेहतर हो सके।

मियावाकी तकनीक से हमारा प्रयोग सफल रहा है। इससे उन वन क्षेत्रों का घनत्व बढ़ाने की उम्मीद जगी है जहां पेड़ पौधे कम हैं। कह सकते हैं कि और अच्छी मेहनत की जाए तो बंजर जंगलात भी धीरे धीरे हरेभरे होने लगेंगे। जापानी तकनीक से वनाच्छादित क्षेत्र को बेहतर ढंग से बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी।

– राजेंद्र प्रसाद जोशी, शोध अधिकारी वन अनुसंधान केंद्र कालिका रानीखेत

 

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