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आज खुलेंगे सबरीमला मंदिर के कपाट

तिरूवनंतपुरम: सबरीमला मामले को उच्चतम न्यायालय के वृहद पीठ में भेजे जाने के शीर्ष अदालत के फैसले की पृष्ठभूमि में, भगवान अयप्पा मंदिर शनिवार यानी आज खुलेगा. केरल सरकार ने कहा है कि, जो महिलायें मंदिर में प्रवेश करना चाहती है उन्हें ‘अदालती आदेश’ लेकर आना होगा.

कड़ी सुरक्षा के बीच, केरल के सबरीमला स्थित भगवान अयप्पा मंदिर दो महीने के तीर्थयात्रा सीजन के लिए शुक्रवार शाम को खुल जाएगा. राज्य की माकपा नीत एलडीएफ सरकार सभी के लिए निर्बाध तीर्थ यात्रा सुनिश्चित करने की तैयारी कर रही है. कंदरारू महेश मोहनारारू गर्भगृह को खोलेंगे और पूजा करेंगे.

एक के सुधीर नंबूदिरी सबरीमाला मेलशांति और एम एस परमेश्वरन नंबुदिरी मलिकापुरम मेलशांति के रूप में कार्यभार संभालेंगे. पदी पूजा के बाद तीर्थयात्रियों को 18 पवित्र सीढ़ियों पर चढ़ने और दर्शन करने की अनुमति होगी.

राज्य के पथनमथिट्टा जिले के पश्चिमी घाट में एक आरक्षित वन में स्थित पहाड़ी मंदिर के कपाट आज शाम 5 बजे के आसपास खोले जाएंगे. आज से दो महीने तक चलने वाला मंडलम मकरविलक्कू का सीजन शुरू हो रहा है. केरल और पड़ोसी राज्यों के विभिन्न हिस्सों से भक्तों ने निलक्कल और पंबा में पहुंचना शुरू कर दिया है, लेकिन उन्हें दोपहर 2 बजे तक ही मंदिर के लिए रवाना होने दिया जाएगा.

पिछले साल एलडीएफ सरकार ने 28 सितंबर, 2018 को उच्चतम न्यायालय के फैसले को लागू करने का फैसला किया था, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में पूजा करने की इजाजत दी गई है. फैसले के बाद राज्य भर में और मंदिर के आस-पास दक्षिणपंथी संगठनों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था.

सदियों से 10 से 50 वर्ष के रजस्वला उम्र वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने पर रोक लगी थी. इस साल, शीर्ष अदालत ने इस मामले में अपना फैसला नहीं सुनाते हुये मामले को एक वृहद पीठ के पास भेज दिया, लेकिन सरकार पूरी सतर्कता बरत रही है. सरकार ने 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर तक पहुंचने के लिए पुलिस सुरक्षा नहीं देने का फैसला किया है.

शीर्ष अदालत ने इस धार्मिक मामले को बृहद पीठ में भेजने का निर्णय किया था. शीर्ष अदालत ने पहले पिछले साल रजस्वला उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी.

17 नवंबर से शुरू होने वाले दो महीने की लंबी वार्षिक तीर्थयात्रा सत्र के लिए शनिवार को मंदिर खुल रहा है.

केरल के देवस्वओम मंत्री के सुरेंद्रन ने शुक्रवार को कहा कि सबरीमला आंदोलन करने का स्थान नहीं है और राज्य की एलडीएफ सरकार उनलोगों का समर्थन नहीं करेगी जिन लोगों ने प्रचार पाने के लिए मंदिर में प्रवेश करने का ऐलान किया है.

भगवान अयप्पा मंदिर में प्रवेश करने वाली महिला कार्यकर्ताओं को पुलिस सुरक्षा प्रदान किये जाने संबंधी खबरों को खारिज करते हुए सुरेंद्रन ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले को ले कर ‘कुछ भ्रम’ है और सबरीमला मंदिर जाने की इच्छुक महिलाओं को ‘अदालत का आदेश’ लेकर आना चाहिए.

उच्चतम न्यायालय ने गुरूवार को इस मामले पर फैसला देते हुए इसे वृहद पीठ को सौंपने का निर्णय किया है, इसी परिप्रेक्ष्य में संवाददाताओं के पूछे गए सवाल का जवाब सुरेंद्रन दे रहे थे.

फैसले में कहा गया, ‘…फैसले का अनुपालन वैकल्पिक मामला नहीं है. अगर ऐसा होता, तो अदालत का प्राधिकार उन लोगों द्वारा वैकल्पिक तौर पर कम किया जा सकता था जो उसके फैसलों के अनुपालन के लिये बाध्य हैं.’ फैसले में कहा गया, ‘आज कोई व्यक्ति या प्राधिकार खुले तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों या आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता, जैसा की संविधान की व्यवस्था है.’

हालांकि, प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा के बहुमत के फैसले ने इस मामले को सात न्यायाधीशों की वृहद पीठ को भेजने का निर्णय किया. इसमें सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति से संबंधित शीर्ष अदालत के 2018 के फैसले की पुनर्विचार की मांग की गयी थी. सबरीमला मंदिर 17 नवंबर को खुल रहा है.

दरअसल, बहुमत के फैसले ने समीक्षा याचिका को सात न्यायाधीशों की वृहद पीठ के लिए लंबित रखा है और 28 सितंबर 2018 के फैसले पर रोक नहीं लगायी है इसलिए सभी आयु वर्ग की लड़कियां और महिलायें मंदिर में जाने की पात्र हैं .

न्यायमूर्ति नरिमन ने कहा कि दस वर्ष से 50 वर्ष की आयु के बीच की निहत्थी महिलाओं को मंदिर में पूजा करने के उनके मौलिक अधिकार से वंचित रखने की दुखद स्थिति के आलोक में यह संवैधानिक कर्त्तव्य को फिर से रेखांकित कर रहा है. इसमें आगे कहा गया कि जो भी शीर्ष अदालत के निर्णयों का अनुपालन नहीं करता है, ‘वह अपने जोखिम पर ऐसा करता है.’

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