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स्कूली वाहन चालकों के पास ड्राइविंग लाइसेंस हैं, न ही फिटनेस प्रमाण-पत्र

देहरादून: स्कूली वाहन अनाडिय़ों के हाथों में दौड़ रहे। न तो चालकों के पास ड्राइविंग लाइसेंस हैं, न ही वाहन में फिटनेस प्रमाण-पत्र। निजी स्कूलों की बसें तो बिना फिटनेस व टैक्स बगैर ही दौड़ती मिलीं। स्कूली वैन और आटो में तो बच्चे भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे जा रहे हैं एवं ई-रिक्शा में तमाम सुरक्षा को दरकिनार कर बच्चों का परिवहन किया जा रहा।

यह परवाह जिम्मेदार सरकार, जिला प्रशासन व परिवहन विभाग को है न मोटी फीस वसूल रहे स्कूल प्रबंधन को। सोमवार को जिले में परिवहन विभाग ने स्कूल और कालेजों की बसों व अन्य स्कूली वाहनों की चेकिंग की तो यही हाल सामने आए। हद तो यह रही कि एक वैन में 12 की जगह पर 17 बच्चे ठूंसे हुए थे। चेकिंग में नौ वाहनों को सीज कर दिया गया जबकि 48 के चालान किए गए। सीज वाहनों में स्कूल बसें, वैन और दुपहिया शामिल हैं।

50 प्रतिशत स्कूल भगवान भरोसे

बात स्कूली बच्चों की परिवहन सुविधा की करें तो जिले में सिर्फ 10 प्रतिशत स्कूल और कालेज ही ऐसे हैं, जिनकी अपनी बसें चलती हैं, जबकि 40 प्रतिशत स्कूल ऐसे हैं जो कांट्रेक्ट पर निजी बसों की सुविधा लेते हैं। बाकी 50 प्रतिशत स्कूल भगवान भरोसे हैं। दो साल कोरोना काल के नाम पर खड़े रहे स्कूली वाहन अब फिर से चले तो सभी नियम ताक पर रख दिए।

स्कूली वाहनों की शिकायतों पर आरटीओ प्रवर्तन सुनील शर्मा की ओर से अभियान चलाने के निर्देश दिए गए तो सोमवार को पहले ही दिन परिवहन टीमों ने जिलेभर में कार्रवाई की।

दून शहर में राजपुर रोड, घंटाघर, जोगीवाला से लेकर नंदा की चौकी, डालनवाला, चकराता रोड, जीएमएस रोड, आइएसबीटी और सहारनपुर रोड समेत हरिद्वार बाइपास पर स्कूली बसों व वैन का चेकिंग अभियान चलाया।

वसंत विहार, सहस्रधारा रोड, डालनवाला, कैंट, चकराता रोड, प्रेमनगर में स्कूल बसें अपने रूटों के बजाए दूसरे रूटों पर दौड़ती मिलीं। कुछ बसें बिना परमिट, टैक्स और फिटनेस के दौड़ रही थीं।

चार बसों के चालकों के पास लाइसेंस ही नहीं था। ये बसें सीज की गईं। वैन में भी यही स्थिति थी। वैन और आटो में बच्चे ठूंस-ठूंसकर भरे मिले। एक वैन प्राइवेट चल रही थी। जिसे सीज किया गया। आरटीओ ने बताया कि शहर समेत ऋषिकेश और विकासनगर में भी अभियान चलाया गया।

18 बच्चे दुपहिया पर पकड़े

परिवहन टीमों ने दून शहर व ऋषिकेश में 18 बच्चे ऐसे पकड़े तो दुपहिया पर स्कूल जा रहे थे। इनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं थे। बताया जा रहा कि सभी नाबालिग हैं। पहले दिन इनके वाहनों का चालान कर अभिभावकों को चेतावनी दी गई। नियम के अनुसार ऐसे मामले में वाहन सीज करने व अभिभावक पर मुकदमे का प्रविधान है।

अभिवभावकों के लिए विकल्प नहीं

निजी स्कूल बसों के साथ ही आटो-वैन चालक क्षमता से कहीं ज्यादा बच्चे ढो रहे हैं। इन्हें न नियम का ख्याल है और न ही सुरक्षा के इंतजाम। अभिभावक इन हालात से अंजान नहीं हैं, लेकिन दिक्कत ये है कि स्कूलों ने विकल्पहीनता की स्थिति में खड़ा किया हुआ है।

निजी स्कूल यह जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं। न बच्चों की परवाह है, न अभिभावकों की। बच्चे कैसे आ रहे या कैसे जा रहे हैं, स्कूल प्रबंधन को इससे कोई मतलब नहीं। बेचारे अभिभावक इसी विकल्पहीनता की वजह से निजी बसों या आटो-विक्रम को बुक कर बच्चों को भेज रहे हैं।

…भगवान न करे कोई हादसा हो जाए तो

फिटनेस व बीमे के बिना दौड़ रहे स्कूली वाहन न सिर्फ कानून तोड़ रहे बल्कि बच्चों की जान से सीधे खिलवाड़ भी कर रहे हैं। भगवान न करे अगर इन वाहन का हादसा हो जाए तो कानूनन इसमें मुआवजा मिलना भी मुनासिब नहीं।

स्कूली वाहनों को लेकर हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि सिर्फ निर्धारित मानक वाले ही वाहन संचालित हों। अवैध तरीके से संचालित सभी वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्कूलों को भी अपनी बसें लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जहां तक चालक व परिचालक के अनुभव और लापरवाही की बात है तो परिवहन विभाग इसकी जांच भी कर रहा है।’

– सुनील शर्मा, आरटीओ प्रवर्तन

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