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दरमानी लाल की हस्तकला के है सभी मुरीद

चमोली: उत्तराखंड के चमोली जिले के बंड पट्टी का एक ग्रामीण। नाम है दरमानी लाल। दरमानी लाल की हस्तकला का आज भी हर कोई मुरीद है। पिछले चालीस सालों से दरमानी लाल अपनी इस कला को संजोए हुए हैं। आई उत्तराखंड को दरमानी लाल की कहानी फेसबुक से पता चली। यों तो दरमानी लाल के बारे में कइयों ने लिखा है लेकिन फेसबुक पर ग्राउंड जीरो से संजय चौहान की रिपोर्ट आपके लिए पेश है।

40 साल से लगे हैं हस्तशिल्प में

उम्र के जिस पड़ाव पर अमूमन लोग घरों की चाहरदीवारी तक सीमित होकर रह जाते हैं वहीं सीमांत जनपद चमोली की बंड पट्टी के किरूली गांव निवासी 63 वर्षीय दरमानी लाल जी इस उम्र में हस्तशिल्प कला को नयी पहचान दिलाने की मुहिम में जुटे हुए हैं। वे विगत 40 सालों से रिंगाल के विभिन्न उत्पादों को आकार दे रहें हैं। रिंगाल के बने कलमदान, लैंप सेड, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोकरी, टोपी, स्ट्रैं सहित विभिन्न उत्पादों को इनके द्वारा आकार दिया गया है। कई जगह ये रिंगाल हस्तशिल्प के मास्टर ट्रेनर के रूप में लोगों को ट्रेनिंग दे चुके हैं।

युवाओं को आना होगा आगे

उत्तराखंड में वर्तमान में करीब 50 हजार से अधिक हस्तशिल्पि हैं जो अपने हुनर से हस्तशिल्प कला को संजो कर रखे हुए हैं। ये हस्तशिल्पि रिंगाल, बांस, नेटल फाइबर, ऐपण, काष्ठ शिल्प और लकड़ी पर बेहतरीन कलाकरी के जरिए उत्पाद तैयार करते आ रहें हैं। लेकिन बाजार में मांग की कमी, ज्यादा समय और कम मेहनताना मिलने की वजह से युवा पीढ़ी अपनी पुश्तैनी व्यवसाय को आजीविका का साधन बनाने में दिलचस्पी कम ले रही है। परिणामस्वरूप आज हस्तशिल्प कला दम तोड़ती और हांफती नजर आ रही है।

क्यों संकट में है हस्तशिल्प

बकौल दरमानी लाल जी रिंगाल की टोकरी और अन्य उत्पादों की जगह अब प्लास्टिक ने ले ली है। पहाडो में पलायन की वजह और गांव में खेती की तरफ लोगों का रूझान खत्म हो गया है जिससे रिंगाल के उत्पादों की मांग घट गयी है। परिणामस्वरूप आज हस्तशिल्प व्यवसाय पर भी संकट गहरा गया है। जिस कारण अब हस्तशिल्प कला से परिवार का भरण पोषण करना बेहद कठिन हो गया है। लोगों को मजबूरन हस्तशिल्प की जगह रोजगार के अन्य विकल्प ढूंढने पड़ रहे हैं।

बेटा भी दे रहा है साथ

वहीं अपने पिताजी दरमानी लाल जी के साथ रिंगाल के उत्पादों को तैयार कर रहे राजेन्द्र कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में रिंगाल के उत्पादों की भारी मांग है परंतु हस्तशिल्पियों की तस्वीर नहीं बदल पाई है। जबकि हस्तशिल्प रोजगार का बड़ा साधन साबित हो सकता है। यदि हस्तशिल्प उद्योग और हस्तशिल्पियों को बढ़ावा और प्रोत्साहन मिले तो पहाड़ की तस्वीर बदल सकती है। बाजार की मांग के अनुरूप हमें नये लुक और डिजाइन पर फोकस करना होगा। पीपलकोटी की आगाज फैडरेशन जरूर इस दिशा में हस्तशिल्पियों को समय समय पर प्रशिक्षित करती रहती है।

अगर आपको इनके बनाये रिंगाल के उत्पाद पसंद हैं तो आप इनसे सम्पर्क कर सीधे फोन पर डिमान्ड भी दे सकते हैं।
राजेंद्र 87550 49411

 

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