देश/प्रदेश

हंसेश्वर मठ में माघ महोत्सव का हवन और भंडारे के साथ समापन

तीतरी (पिथौरागढ़) : भारत नेपाल सीमा पर स्थित अस्कोट क्षेत्र से काली नदी किनारे हंसेश्वर मठ में माघ महोत्सव का हवन और भंडारे के साथ समापन हो गया है। समापन अवसर की मुख्य अतिथि नगरपालिका डीडीहाट की अध्यक्ष कमला चुफाल थी।

25 जनवरी से प्रारंभ माघ महोत्सव में प्रतिदिन काली नदी में स्नान, मठ के मंदिर में कथा वाचन, प्रवचन और भजन कीर्तन हुए। इस दौरान किशोरों के जनेऊ संस्कार किए गए। प्रतिदिन भंडारा हुआ। बीसवें माघ महोत्सव में दूर -दूर से साधु संत और भक्तजन पहुंचे।

ग्यारह दिवसीय माघ महोत्सव में हजारों लोगों ने मठ में पहुंच कर पूजा अर्चना और नदी में पवित्र स्नान किया। इस दौरान सैकड़ों युवाओं का जनेऊ संस्कार किया गया। महोत्सव के दौरान दूर-दूर से पहुंचे साधु संतों का लोगों ने आशीर्वाद लिया।

काली नदी के सूरज कुंड और भैरव कुंड में स्नान और जनेऊ संस्कार किए गए।महोत्सव के समापन अवसर पर भारत के अलावा नेपाल से भी भारी संख्या में लोग जुटे। इस अवसर पर मुख्य अतिथि नपा अध्यक्ष कमला चुफाल ने कहा कि हंसेश्वर मठ आस्था का प्रमुख केंद्र है।

मठ की विशेषता से इस मठ को विशेष महत्व का माना जाता है। उन्होंने माघ महोत्सव को अगले वर्ष से अधिक आकर्षक बनाने के लिए सहयोग देने का आश्वासन दिया। कथा वाचक पुष्कर राज ओझा रहे।

महोत्सव के संचालन में कमान सिंह कठायत, अशोक पाल, अशोक कुमार धामी, ललित सिंह धामी, रघुवीर, भगवान अवस्थी पुष्कर राम, अनिल धामी आदि ने विशेष सहयोग दिया।

शिव-पार्वती के हंस रू प में आने नाम पड़ा हंसेश्वर स्थानीय मान्यता के अनुसार त्रेता युग में शिव पुत्र कार्तिकेय जब नाराज हो गए थे तो काली नदी किनारे पहुंचे। इसकी जानकारी मिलने पर कैलास से भगवान शिव और पार्वती नेपाल के मल्लिकार्जुन आए।

जहां से कार्तिकेय को मनाने के लिए शिव और पार्वती हंस के रू प में यहां पहुंचे और उन्होंने काली नदी पर जिस स्थान पर स्नान किया, उस जगह का नाम सूरज कुंड और मठ का नाम हंसेश्वर पड़ गया।

हंसेश्वर मठ में ढाई सौ साल से नियमित धूनी जल रही है। इस मठ से 78 गांव जुड़े हैं। अस्कोट, तल्लाबगड़, गर्खा, जौलजीवी, सिंगाली,डीडीहाट सहित अन्य स्थानों का यह प्रसिद्ध आस्था का केंद्र है।

 

विशेष