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लखवाड़ परियोजना उत्तराखंड को मिलेगी ऊर्जा, और अन्य पांच राज्यों को मिलेगा पानी

उत्तराखंड की झोली में लखवाड़ जल विद्युत परियोजना के रूप में केंद्र सरकार से एक और तोहफा आया है। यमुना नदी पर बनने वाली 300 मेगावाट की लखवाड़ जल विद्युत परियोजना से उत्तराखंड की ऊर्जा के क्षेत्र में ताकत बढ़ेगी। साथ ही उत्तर प्रदेश समेत पांच अन्य पड़ोसी राज्यों को भी पीने और सिंचाई के लिए भरपूर पानी मिल सकेगा। पखवाड़े भर के अंतराल में उत्तराखंड के हिस्से यह चौथी बड़ी उपलब्धि आई है। इससे पहले दून-दिल्ली आर्थिक गलियारा, देहरादून से मेरठ के बीच एक्सप्रेस-वे के लिए एलिवेटेड रोड और चारधाम आलवेदर परियोजना की बाधाएं दूर कर केंद्र सरकार उत्तराखंड की बड़ी मुश्किलें हल कर चुका है।

204 मीटर ऊंचा बांध बनेगा

देहरादून जिला मुख्यालय से करीब 72 किलोमीटर दूर पछवादून में लोहारी व जुड्डो गांव के निकट इस परियोजना के लिए यमुना नदी पर 204 मीटर ऊंचा बांध बनाया जाएगा। बांध की जल संग्रहण क्षमता 330.66 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी। जिससे करीब 33780 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा सकेगी।

40 से 60 लाख यूनिट बिजली मिलने का अनुमान

लखवाड़ जल विद्युत परियोजना के पूर्ण होने पर राज्य को 40 से 60 लाख यूनिट बिजली प्राप्त होने का अनुमान है, जो कि पीक आवर में प्रदेश में होने वाली विद्युत कमी से भी अधिक है। ऐसे में उत्तराखंड अपनी जरूरत को पूरा करने के साथ ही बिजली बेच भी सकेगा।

छह राज्यों को सीधा लाभ

लखवाड़ जल विद्युत परियोजना का लाभ उत्तराखंड समेत सात छह राज्यों को मिलेगा। इससे दिल्ली, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा व राजस्थान को 78.83 मिलियन क्यूसेक मीटर पानी प्राप्त होगा। वर्ष 1994 में यमुना के बेसिन क्षेत्र वाले इन राज्यों के मध्य यह समझौता हुआ था।

1992 से रुका है काम

लखवाड़ बहुद्देशीय परियोजना का सपना वर्ष 1976 में देखा गया था। केंद्र सरकार से मंजूरी के बाद कार्य शुरू हुआ। वर्ष 1987 से 1992 तक लगभग 40 किमी सड़क, बुनियादी ढांचागत कार्य, डाइवर्जन टनल, इंटेक का खुदान कार्य, भूमिगत विद्युत गृह का खुदान कार्य, कंट्रोल रूम एडिट, टेलरेस टनल का खुदान कार्य किया गया। लगभग 30 प्रतिशत कार्य होने के बाद परियोजना का काम वर्ष 1992 में पर्यावरणीय पहलुओं के चलते रोक दिया गया था। 300 मेगावाट की इस परियोजना को दोबारा शुरू करने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशानुसार पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरणीय स्वीकृति मिलनी बाकी थी। इसी साल फरवरी में केंद्र से पर्यावरणीय स्वीकृति भी प्राप्त हो गई थी। परियोजना के बजट का पुनर्मूल्यांकन किए जाने के बाद केंद्रीय वित्त समिति से मंजूरी का इंतजार था।

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