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कोरोना लॉकडाउन पलायन: संकट की इस घड़ी में पहाड़ों के प्रवासी चाहकर भी अपने गांवो को नहीं लौट पा रहे है

ये उच्ची डांडी कांठी, ये गैरि-गैरि रौंत्यलि घाटी, न जा न जा न जावा छोड़िकी अपड़ि जल्म भूमि माटी, बोल्यूं माना, बोल्यूं माना, बोल्यू माना। लोक गायक नरेन्द्र नेगी जी का यह गढ़वाली गीत के बोल आज उन प्रवासियों पर बैठ रहे है, जिन्होंने अपनी पैतृक मकान और भूमि छोड़कर दूर प्रदेशों में बस चुके है। जो करोना जैसे संकट से बचने के लिए अपने पैतृक गांव इसलिए वापस नहीं आ पा रहे है, क्यूंकि उन्होंने कभी अपने पैतृत मकान की सुध नहीं ली और आज खंडहर में तब्दील हो चुके है।

संकट की इस घड़ी में प्रवासियों को गांव का बचपन, मिट्टी, जीवनदायनी संस्कृति की याद जरूर आ रही होगी और वह गांव का नाम लेकर वापस लौटना चाहते हुए भी वापस नहीं लौट पा रहे है। क्यूंकि उन्होंने कभी अपने पैतृक गांव के साथ ही पैतृक पठाल वाले मकान की सुध तक नहीं ली।

यहां तक अपनी नई पीढ़ी को भी गांव की पगडंडियों से दूर रखा। जिस कारण प्रवासी लोग आज शहरों में कैद है। गांव में खंडहर हुए मकान की सुध लेकर उसे रहने लायक बनाया होता तो आज गांव आकर खेतों की सैर तो किया करते। किंतु गांव की कीमत आज दशकों पूर्व गांव को छोड़कर चले जाने वालों को पता चल रही है।

इस तरह से गांव में खंडहर हो चुके पैतृक भवन

जो गांव आये भी उन पर शक की निगाह
जिनके गांव में भवन थोड़ा बहुत सही है वह बाहरी प्रदेशों से घर तो आये है, किंतु उनसे गांव वाले कोरोना के चक्कर में मेल-मिलाप भी नहीं कर पा रहे है। उन्हें गांव वाले शक की निगाह से देख रहे है। जो गांव में केवल देवता पूजने आते थे वहीं उनमें से कई लोग संकट के घड़ी में अपने पैतृक गांव में पहुंचे है।
प्रवासियों के साथ नौकरी वाले सबसे अधिक गांव पहुंचे 
गांव छोड़ दशकों पूर्व प्रदेशों में पलायन कर चुके उनमें से वहीं प्रवासी गांव लौटे है, जिन्होंने थोड़ा बहुत अपने पैतृक मकान को सही रखा है। किंतु बाहरी प्रदेशों या विदेश से वहीं युवा गांव पहुंचे है, जो नौकरी पेशा के लिए गये थे। जिन्हें भी गांवों में प्रशासन ने क्वारंटीन रखा है।
पौराणिक संस्कृति का संरक्षण जरूरी
गांवों पर पलायन नहीं होता तो आज गांवों में लोग कोदा, झंगोरा, धान, गेंहू, तिमले की सब्जी, कंडाली की सब्जी, कड़ी पत्ता जैसी कई घरेलू खाद सामग्री संकट के घड़ी में गांव में रहकर खा सकते थे। जबकि पौराणिक घराट में गेहूं की पिसाई कर सकते थे। किंतु आज पौराणिक संस्कृति से लोगों ने मुंह मोड़ दिया, जिसे संरक्षण और बढ़ाने की आज जरूरत है।
32 हजार से अधिक लोग पहुंचे पांच जिलों के गांव
कोरोना संकट में पांच जिलों में 32 हजार 197 लोग गांव पहुंचे है। जिला प्रशासन एवं कट्रोल रूप से ली जानकारी के मुताबिक जिला उत्तरकाशी में 3912, पौड़ी में 10531, रुद्रप्रयाग में 4013, चमोली में 3000, टिहरी 10741 लोग अपने गांव वापस लौटे है। जबकि कई लोगों का अभी भी किसी तरह से गांव आना जारी है।

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