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फूलदेई त्योहार के रूप में बुराँस के फूलो का संरक्षण की परंपरा बनाई थी हमारे पूर्वजो ने: वृक्षमित्र सोनी।

फूलदेई त्योहार के रूप में बुराँस के फूलो का संरक्षण की परंपरा बनाई थी हमारे पूर्वजो ने: वृक्षमित्र डॉ सोनी।
देहरादून। उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्रो में उगने वाला बुरांश का पेड़ जहाँ अपनी सुंदरता के लिए आकर्षक का केंद्र हैं वही लाल बुराँस औषधि का खजाना भी हैं। यह पौधा पर्वतीय क्षेत्रो के ऊँचाई वाले भागो में पाया जाता हैं जानकारी का अभाव होने के कारण भी हमारे पूर्वज इसकी सुरक्षा की दृष्टि से प्राचीनकाल से ही बुराँस के फूलों का उपयोग फूलदेई त्यौहार के रूप में किया करते थे ताकि यह फूल हमारे आनेवाली पीढ़ी के लिए संरक्षित रहे। यह पर्व उत्तराखंड में चैत्र मास के पहली गत्ते (पहला दिन) को मनाया जाता हैं। इसदिन गांव के बच्चों की टोलियां बुराँस, फ्यूंली, आड़ू, पुलम, नासपती, सिलमोड़ के फूलो को सुबह होते ही घरों के देहलीज पर डालते है ताकि बसंत की बहार की जैसी खुशियां घर में आये।बच्चे जब घरों में फूल डालते हैं तो घर वाले बच्चों को गुड़, मिसरी, चावल, दाले, मिठाइयां, टॉफी व पैसे देते हैं सभी बच्चे इकठ्ठे होते हैं और एक साथ गुड़ चावल को भूनकर खाते है लेकिन वक्त के साथ-साथ लोग शहरीकरण के वजह इस लोकपर्व फूलदेई त्योहार को भूलने लगे हैं।
पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे पर्यावरणविद् वृक्षमित्र डॉ त्रिलोक चंद्र सोनी से जब हमने पूछा तो वो कहते हैं फूलदेई त्योहार हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ हमारे पूर्वजों की धरोहर हैं क्योंकि हमारे पूर्वज इतने जानकार, अनुभवी व विद्धान थे जो पौधे हमारे पीढ़ी को लाभकारी होते थे उन्हें त्योहारों व देवपूजन से जोड़ कर उनका पूजन किया करते थे ताकि वे पेड़ पौधे बचे रहे जैसे बुराँस, पीपल, बरगद, पय्या, सुराई, तुलसी अन्य। डॉ सोनी कहते हैं बुराँस की मैं बात करूं तो वह पेड़ औषधि भंडार के रूप में हैं जिसके फूल के रस से दिल की बीमारी, किटनी, हड्डियों के दर्द, खून की कमी को दूर करने, स्किन व त्वचा में निखार व अन्य बीमारियों में लाभकारी है। यही नही इनके पत्तियां पशुओं में बिछवाने के साथ इनसे जैविक खात भी तैयार किया जाता हैं और इसकी लकड़ियों से फर्नीचर व कृषि के उपकरण बनाये जाते हैं। आज पलायन की मार यह त्योहार भी झेल रहा हैं गांव छोड़कर जो लोग शहरों में चले गए है। उनके बच्चे इस फूलदेई त्योहार से कोसो दूर जा रहे है। कह सकते हैं कि अपनी एक विरासत की संस्कृति विलुप्त की कगार पर है। हमे इस त्योहार से अपने बच्चों को जोड़ना चाहिए ताकि फूलदेई त्योहार जैसी हमारी संस्कृति बची रही जिसके लिए आम जनमानस को आगे आने की जरूरत हैं।

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