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देहरादून में जमीन की खरीद-बिक्री के नाम पर क्यों नहीं रुक रही है धोखाधड़ी

देहरादून। किटी/कमेटी पर तो पुलिस की ताबड़तोड़ कार्रवाई से अंकुश लग गया। लेकिन, जमीन की खरीद-बिक्री के नाम पर धोखाधड़ी रुक नहीं रही। आए दिन खबरें आती हैं कि किसी ने जमीन के नाम पर लाखों गंवा दिए तो किसी ने करोड़ों। सवाल यह है कि आखिर भूमाफिया के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं? दरअसल, उत्तराखंड ही नहीं दिल्ली, हरियाणा, पंजाब के भी तमाम पैसे वालों का सपना होता है कि देहरादून में भी उनका एक आशियाना बन जाए। उन्हें यहां के बारे में ज्यादा जानकारी तो होती नहीं। बस, इसी का फायदा उठाकर प्रॉपर्टी डीलर के भेष में बैठे जालसाज उन्हें शिकार बनाकर चंपत हो जाते हैं। हालांकि, पिछले दिनों जमीन धोखाधड़ी में लिप्त शातिरों पर पुलिस ने गैंगस्टर की कार्रवाई कर यह संदेश जरूर दिया है कि अब वह बचने वाले नहीं। मगर, सचेत उन लोगों को भी होना है जो जमीन खरीदते वक्त आंख मूंदकर सौदा कर लेते हैं।

तकनीक के मामले में होशियार बनें

अभी कुछ दिन पहले देहरादून पुलिस ने झारखंड से ऐसे साइबर ठगों को दबोचा, जो अपना नाम-पता तक लिखना नहीं जानते। लेकिन, सैकड़ों पढ़े-लिखे लोगों को लाखों रुपये की चपत लगा चुके हैं। अब सवाल यह है कि साइबर ठगी के लगातार बढ़ते मामलों और बैंक व सरकार के तमाम संदेशों के बाद भी हम सतर्क क्यों नहीं हो रहे? इंटरनेट और सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म पर एक्टिव रहने के बावजूद खुद को बदलती तकनीक से अपडेट क्यों नहीं कर रहे। इसके फायदे तो हम जानते हैं, लेकिन खतरों और उनसे बचाव के तरीकों पर गौर करने की जहमत नहीं उठा रहे। यही चंद कारण हैं, जिनका फायदा उठाकर कुछ अंगूठा छाप हमारी गाढ़ी कमाई पर हाथ साफ कर देते हैं। हम खुद के होशियार होने की गलतफहमी में ही उलझे रह जाते हैं। सो, अब हर किसी को तकनीक के मामले में भी होशियार बनने की जरूरत है।

रोज आंदोलनों से जूझती दून पुलिस

बीते वर्ष दिसंबर से देहरादून कभी नागरिकता संशोधन कानून, बिना आरक्षण पदोन्नति और अब फॉरेस्ट भर्ती घोटाले को लेकर रणभूमि बना हुआ है। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता होगा, जब शहर में कहीं धरना-प्रदर्शन न हो और कोई रैली या जुलूस न निकले। इससे शहर की कानून व्यवस्था तो बिगड़ ही रही है, पुलिस का काम भी कई गुना बढ़ गया है। यह स्थिति तब है जब तमाम राजनीतिक, सामाजिक और कर्मचारी संगठन इस बात की दुहाई देते नहीं थकते हैं कि आंदोलनों से शहर की व्यवस्था बिगड़ती है और आम लोगों को कहीं न कहीं परेशानी उठानी पड़ती है। लेकिन, अब लोकतंत्र है तो सबको अपनी बात कहने की आजादी भी है। फिर जनता की परवाह करने के लिए सिस्टम है। बस इसी का फायदा उठाकर देहरादून को अखाड़ा बनाने की हर संभव कोशिश जारी है। जिससे निपटने के लिए पुलिस को हर रोज पसीना बहाना पड़ा है।

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