विविध

पांच अविष्कार, जिन्होंने महिलाओं की दुनिया ही बदल दी

वैसे तो ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जिनकी खोज से आधी आबादी को मानसिक सुकून और शारीरिक आराम मिला. लेकिन यहां ऐसी 5 बड़ी खोजों का जिक्र किया जा रहा है, जिनसे महिलाओं की दुनिया ही बदल गई.

1. गर्भनिरोधक गोलियां

गर्भनिरोधक गोलियों (Combined Oral Contraceptive Pill) के आविष्कार को मानव इतिहास की बड़ी खोज माना जा सकता है. आज यह बर्थ कंट्रोल का बहुत ही पॉपुलर तरीका है. एक दौर था, जब बच्चे ‘भगवान की मर्जी’ से हुआ करते थे. समझ लीजिए कि इस गोली की खोज के साथ ही भगवान ने यह जिम्मा महिलाओं के हाथों में सौंप दिया.

कैसे हुई शुरुआत?

गर्भनिरोधक गोलियों की शुरुआत 1960 के दशक में हुई, जब पहली बार अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने एक भरोसेमंद पिल की सिफारिश की. इससे महिलाओं के इस्तेमाल के लिए बना पहला गर्भनिरोधक सामने आ सका. बाद के दौर में इसमें सुधार होते गए.

क्या बदला?

इस छोटी-सी गोली ने महिलाओं को यह चुनने की आजादी दी कि वे कब गर्भवती होना चाहती हैं, कब नहीं और कितने बच्चे पैदा करना चाहती हैं. प्रेग्नेंसी को काबू में करने से महिलाओं के पास अब अपने लिए ज्यादा समय बचने लगा. इसका इस्तेमाल वो अपनी पढ़ाई या करियर को संवारने में करने लगीं. अनचाहे गर्भ को रोकने की वजह से इस गोली ने अनगिनत महिलाओं की जान बचाई.

हालांकि इन गोलियों के इस्तेमाल से कुछ साइड इफेक्ट की रिपोर्ट भी सामने आई हैं. इन्हें डॉक्टर की सलाह के बाद ही लेना चाहिए. फिर भी यह गोली ‘गेमचेंजर’ है.

2. सैनिटरी पैड

सैनिटरी पैड का नाम लेने में तो लोग आज भी झिझकते हैं, लेकिन इसी थीम पर हिंदी फिल्म (पैडमैन) बनने के बाद कुछ खुलापन जरूर आया है.

कैसे हुई शुरुआत?

आज जो सैनिटरी पैड चलन में है, वह लंबा सफर तय करने के बाद एक खास आकार ले पाया. शुरुआत में रबड़ की सैनिटरी बेल्ट, चिपकने वाली स्ट्रिप्स जैसी चीजें बाजार में आईं. जॉनसन एंड जॉनसन ने 1890 के दशक में सैनिटरी टॉवेल लॉन्च किया.

आज जो सैनिटरी पैड बाजार में है, उसका सबसे करीबी प्रोटोटाइप 1921 में आया. पहले विश्वयुद्ध के दौरान कॉटन से बनने वाले सैनिटरी पैड का इस्तेमाल जख्मी सैनिकों के जिस्म से खून का बहाव रोकने में किया जाता था. नर्सों ने इस पैड का इस्तेमाल माहवारी के दौरान भी उपयोगी पाया. बाद में उसी चीज को ‘कोटेक्स’ (कॉटन-टेक्सचर के आधार पर) के रूप में पेश किया गया था. यह पहला व्यावसायिक रूप से उपलब्ध डिस्पॉजेबल पैड भी बना.

क्या बदला?

भारी तनाव और झंझट से मुक्ति. सेहतमंद और ज्यादा बिंदास जिंदगी. अब केवल काम पर ही पूरा फोकस. हालात पूरी तरह से बदल गए, अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता. जागरुकता की कमी और कीमत अब भी बड़ी अड़चन है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) की रिपोर्ट बताती है कि 15-24 साल की उम्र वाली यूपी की करीब 70 परसेंट महिलाएं आज भी माहवारी के दौरान वैसे कपड़ों का उपयोग करती हैं, जिनसे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. हालांकि इसी उम्र की देश की करीब 65 परसेंट महिलाएं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करना पसंद करती हैं.

3. गैस स्टोव

गैस स्टोव आने से पहले कोई भी महिला केवल यही गा सकती थी, ‘आंसू भरी है ये जीवन की राहें…’ पर अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है.

कैसे हुई शुरुआत?

गैस स्टोव बनाने की दिशा में पहली ठोस कामयाबी 19वीं शताब्दी में मिली. ब्रिटिश आविष्कारक जेम्स शार्प ने 1826 में एक गैस स्टोव का पेटेंट कराया. उ्न्होंने 1836 में गैस स्टोव कारखाना खोला. 1880 के दशक में इस तकनीक का बिजनेस इंग्लैंड में चल निकला.

20वीं शताब्दी की शुरुआत तक गैस स्टोव पूरे यूरोप और अमेरिका में चलन में आ गए. बाद के दौर में भारत समेत ज्यादातर देशों में घरेलू इस्तेमाल के लिए गैस सस्ती हुई. भारत में रसोई गैस पर सब्सिडी मिलना और फिर इसे सीमित किया जाना तो हाल की बात है.

क्या बदला?

पेट्रोलियम मंत्रालय के एक अनुमानित आंकड़े के मुताबिक, देश में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के 30 करोड़ से ज्यादा एक्टिव घरेलू एलपीजी कनेक्शन हैं.

गैस स्टोव के घर-घर तक पहुंचने से महिलाओं ने काफी कुछ पाया. रोज-रोज लकड़ी या कोयले के धुएं के कारण बहने वाले आंसुओं की धार थम गई. पहले भोजन पकाने से ज्यादा समय तो ईंधन सुलगाने में ही लग जाया करता था. गैस स्टोव आने से समय और श्रम, दोनों की भारी बचत हुई.

इस तरह की बचत का इस्तेमाल करके ही आज महिलाएं विकास के रास्ते पर पुरुषों के बराबर की भागीदार हैं.

4. वॉशिंग मशीन

हाथों से कपड़े धोना झंझट वाला काम है, जिसमें कपड़ों को भिगोना, उबालना, रगड़ना, खंगालना और सूखने के लिए लटकाना शामिल है. इसमें न केवल मेहनत ज्यादा लगती थी, बल्कि समय भी बहुत ज्यादा खपता था. मशीन ने इस समस्या को हल कर दिया.

कैसे हुई शुरुआत?

मैनुअल वॉशिंग मशीन का पहला पेटेंट 18वीं शताब्दी की शुरुआत में दर्ज हुआ. 19वीं शताब्दी के मध्य में भाप इंजन वाली मशीन बनी. 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में इलेक्ट्रिक वॉशिंग मशीन विकसित होने के बाद बड़ी क्रांति आई. मशीन को लेकर बड़ी सफलता 1940 और 50 के दशक में अमेरिका में मिली.

क्या बदला?

वॉशिंग मशीन ने दो तरह से महिलाओं की जान में जान डाली. मशीन में कपड़े धोने से समय और मेहनत की बड़ी बचत तो हुई ही, साथ ही इसने कपड़े धोने के काम में पुरुषों की भी एंट्री करा दी. दरअसल, सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में भी कपड़े धोना महिलाओं का काम माना जाता रहा है, लेकिन वॉशिंग मशीन ने इस सोच को ही धोकर रख दिया.

मशीन ने महिलाओं को सिर्फ शारीरिक ही नहीं, दिमाग से भी सुकून का अहसास कराया.

5. कैमरे वाला स्मार्टफोन

इस लिस्ट में स्मार्टफोन को रखे जाने से कुछ लोग असहमत हो सकते हैं. लेकिन बाकी चारों के साथ इसे रखे जाने की अपनी वजह है. देखिए कैसे.

अब तक गिनाए गए आविष्कारों ने महिलाओं के जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा किया. लेकिन कैमरे लगे छोटे-से स्मार्टफोन ने महिलाओं के अंदर छिपी हुई प्रतिभाओं को दुनिया के सामने लाया. ये टैलेंट कुछ भी हो सकता है- कुछ एक सेकंड का डांस, ड्रामा, कॉमेडी, एक्टिंग या फिर गप्पबाजी. फैशन, ब्यूटी टिप्स और रसोई के अंदर के जायकेदार व्यंजन की तो बात ही क्या!

कैसे हुई शुरुआत?

एलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने अमेरिका में 14 फरवरी, 1876 को टेलीफोन का पेटेंट कराया था. तब से लेकर कई बार इसका चेहरा और कारनामा बदला. चोंगे वाले टेलीफोन को ज्यादातर लोग अब भी नहीं भूले होंगे. फीचर फोन और कैमरा वाला स्मार्टफोन तो हाल की बात है.

क्या बदला?

डिजिटल क्रांति की लहर पर सवार महिलाओं में कई को शोहरत भी मिली और भरपूर दौलत भी, जो कि इस जादुई स्मार्टफोन के बिना संभव नहीं था. ठीक है, यह जादुई चीज पुरुषों को भी मौका दे रही है. लेकिन एक रूढ़िवादी समाज में महिलाओं की कामयाबी अद्भुत है और अतुलनीय भी.

Leave a Response