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उत्तराखंड के जंगलों से होगी यूकेलिप्टस की विदाई

हल्द्वानी: जमीन की उर्वरा शक्ति समाप्त करने और जल स्रोतों का स्तर घटाने वाले यूकेलिप्टस के पेड़ों को अब जंगलों से हटाने का काम किया जा रहा है.

यूकेलिप्टस के पेड़ों की जगह वन विभाग गोरा नीम यानी (मिलिया डुबिया) का पेड़ लगाने जा रहा है. हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र में इस समय मिलिया डुबिया के पौधों की कई प्रजातियों का रिसर्च भी चल रहा है. हल्द्वानी वन विभाग चार जगहों पर मिलिया डुबिया का पौधारोपण भी किया गया है, जिसके अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं.

यूकेलिप्टस का पेड़ उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर जंगलों और कृषि क्षेत्र के आस-पास उपलब्ध है. माना जाता है कि यूकेलिप्टस का पेड़ जल स्रोतों के स्तर को काफी तेजी से घटा रहा है,

साथ ही इसकी पत्तियां एसिड की तरह काम करती हैं, जो जमीन पर गिरकर खेती की उर्वरा शक्ति को कम भी कर रहीं हैं. लिहाजा, यूकेलिप्टस का पेड़ कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है. ऐसे में वन विभाग यूकेलिप्टस के पेड़ का जगह पर अब मिलिया डुबिया का पेड़ लगाने का काम कर रहा है.

हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र के प्रभारी मदन बिष्ट ने बताया कि यूकेलिप्टस के पेड़ों से हो रहे नुकसान के बाद अब विभाग इन पेड़ों को हटाने का काम करने जा रहा है.

इसके तहत पंतनगर, लालकुआं, पीपल पड़ाव और टांडा रेंज के कुछ जंगलों में मिलिया डुबिया का पेड़ लगाया जा रहा है. मदन बिष्ट ने बताया कि यूकेलिप्टस एक ऐसी प्रजाति है जिसके पेड़ के नीचे कोई दूसरी वनस्पति नहीं आती है. साथ ही जिस खेत में यूकेलिप्टस के पत्ते गिरते हैं. वह मिट्टी में मिलकर खेत की उर्वरा शक्ति को कम कर देती है.

उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में मिलिया डुबिया का पौधा बड़े पैमाने पर है लेकिन पंजाब-हरियाणा में इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आए हैं.

दूसरी बात यह है कि यूकेलिप्टस और पॉपुलर की लकड़ी का प्रयोग प्लाईवुड को बनाने में काम आता है. ठीक उसी तरह मिलिया डुबिया की लकड़ी भी प्लाईवुड और अन्य घरेलू सामानों के बनाने में काम आएगा. यही नहीं मिलिया डुबिया का पौधा वन जीवों के भोजन के लिए भी बड़ा मददगार साबित हो सकता है.

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