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पहाड़ों और जंगलों को सहेजता प्रकृति प्रहरी- मनोहर सिंह मनराल

एक आर्मी परिवार से संबंध रखने वाले मनोहर को बचपन से ही प्रकृति से लगाव था। वह बताते हैं कि स्कूल में लंच के समय जब सभी बच्चे खेलते थे तो वह अपना खाना खाकर स्कूल के बगीचे में माली काका से बतियाते थे। उनसे पेड़-पौधों के बारे में जानते-समझते और उनकी मदद करते। धीरे-धीरे वक़्त बीता और इसके साथ ही, उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक में डिप्लोमा कर लिया। घर के सभी लोग चाहते थे कि वह इस क्षेत्र में आगे बढ़े और अपनी एक पहचान बनाएं। इस पहचान की तलाश उन्हें दिल्ली तक ले गई।

Eco-Tourism in Uttarakhand

“वहां नौकरी की खोज में पहुंचा लेकिन ज्यादा दिन रह नहीं पाया। दिल्ली की ज़िंदगी हमें रास नहीं आई और मैं अपने पहाड़ों में वापस लौट आया। उस समय उत्तराखंड को उत्तर-प्रदेश से अलग करने की मांग जोरों पर थी और हमने भी अपने ‘जल, जंगल, ज़मीन’ को बचाने के लिए इस अभियान में साथ दिया,” उन्होंने बताया।

जल, जंगल, ज़मीन को बचाने की मुहिम

साल 2000 में आखिरकार उत्तराखंड को अपनी एक अलग पहचान मिल गयी। लेकिन इस दौरान मनोहर ने ‘जल, जंगल और ज़मीन’ के विचार को आत्मसात कर लिया। उन्हें समझ में आ गया कि वह प्रकृति से दूर नहीं रह सकते और इसलिए उन्होंने अपने गाँव में अपने लोगों के बीच रहकर कुछ करने की ठानी। उनका सफर अपनी बंज़र पड़ी 6 एकड़ ज़मीन से शुरू हुआ। उनके पास फंड्स की कमी थी लेकिन जज़्बे और हौसले की नहीं।

वह कहते हैं, “लोग पूछते हैं कि इतना सब किया तो पैसा कहाँ से आया। लेकिन मैं सोचता था कि जो लोग अनाथ हैं, रेलवे स्टेशन आदि पर दिखते हैं उनके पास तो कुछ भी नहीं होता। फिर भी उनका गुज़ारा हो जाता है। ज़रूरी नहीं कि आपको कुछ करने के लिए बहुत बड़े फंड्स की ज़रूरत होती है। आप कम से कम साधनों में भी ज़िंदगी जी सकते हैं।”

उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 6 एकड़ बंज़र ज़मीन को उपजाऊ बनाया और आज यहाँ लगभग 200 किस्म के पेड़ हैं। इसके साथ ही, उन्होंने इस ज़मीन पर अपना होम स्टे शुरू किया। उस समय गांवों में होम-स्टे जैसा शब्द किसी ने सुना भी नहीं था। लेकिन मनोहर कहते हैं कि जिम कॉर्बेट इस जगह से बहुत पास है और साथ ही, पवलगढ़ कंज़र्वेशन रिज़र्व होने के करण यहाँ यात्रियों का आना-जाना रहता ही है। ऐसे में, उनके दिमाग में आईडिया आया कि क्यों न इन यात्रियों को प्रकृति के बीचों-बीच रुकने की जगह दी जाए। इससे उन्हें एक अलग अनुभव मिलेगा और गाँव के लोगों के लिए रोज़गार का साधन हो जाएगा।

साल 2000 में उन्होंने इको हैरीमैन्स होम-स्टे शुरू किया। सबसे अच्छी बात यह है कि इस होम-स्टे को समुदाय द्वारा संचालित किया जा रहा है। यहाँ पर तीन निजी कमरे और दो डोर्म्स हैं, जिनमें आराम से एक बार में 20 से ज्यादा लोग रह सकते हैं। इसके साथ ही, यहाँ पर मेहमानों के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ हैं जैसे जंगल की सैर, खेती-बाड़ी करना, पशुओं की देखभाल, पारंपरिक खेल जैसे कंचे, गिल्ली-डंडा, लोककथाएं सुनना और अपनी कहानियां सुनाना और यहाँ के खूबसूरत पक्षी और तितलियाँ देखना आदि।

Eco-Tourism in Uttarakhand

“हमारे यहाँ ज़्यादातर वे लोग आते हैं जो पेशे से लेखक हैं या फिर गांवों के जीवन पर, जंगलों पर और प्रकृति पर रिसर्च कर रहे हैं। वे यहाँ रहकर अपना काम करते हैं, हमारे साथ वक़्त बिताते हैं और गाँव के लोगों से घुलते-मिलते हैं। बहुत से लोग तो अपने रिसर्च वर्क की कॉपी भी छोड़कर जाते हैं जिन्हें हम सहेज कर रखते हैं ताकि आगे आने वाले लोगों के काम आ सके,” उन्होंने कहा।

यहाँ पर ठहरने वाले लोगों को स्थानीय खाना ही परोसा जाता है। खाना तैयार करने के लिए सभी सामग्री जैविक है और आस-पास के किसानों से ही ली जाती है। स्थानीय महिलाएं कुमाऊंनी व्यंजन बनातीं हैं जिनका स्वाद ये टूरिस्ट लेते हैं। मनोहर के मुताबिक उनके होम-स्टे से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर 90 ग्रामीणों को रोज़गार मिल रहा है।

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