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उत्‍तराखंड में 6000 उद्योगों पर बंदी की तलवार

देहरादून,  बिना अनुमति भूजल दोहन पर प्रदेश के 7000 के करीब उद्योगों में से 6000 पर बंदी की तलवार लटक गई है। इसके साथ ही भूजल जैसी अनमोल धरोहर के संरक्षण में कोताही बरतने वाले अधिकारी भी कार्रवाई की जद में हैं।

वर्ष 2017 से आदेश और दिशा-निर्देश जारी करने के बाद अब नेशनल ग्रीन टिब्यूनल (एनजीटी) ने अवैध रूप से भूजल दोहन करने वाले उद्योगों पर कार्रवाई करने के स्पष्ट आदेश जारी कर दिए हैं। की गई कार्रवाई का जवाब संबंधित एजेंसियों को 28 नवंबर तक दाखिल करना है।

उधर, एनजीटी की कार्रवाई से डरे उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व केंद्रीय भूजल बोर्ड ने एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालनी शुरू कर दी है।

बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. वसीम अहमद का कहना है कि एनजीटी के आदेश के बाद वर्ष 2017 से अब तक सिर्फ 1100 से करीब इकाइयों ने भूजल दोहन के लिए अनुमति मांगी है।

इसमें से निरस्तीकरण के बाद 900 से 1000 के बीच ही आवेदन शेष रह जाएंगे। ऐसे में इनके अलावा कौन-कौन इकाइयां प्रदेश में हैं, इसकी जानकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राप्त नहीं हो पा रही है।

दूसरी तरफ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एसपी सुबुद्धि का कहना है कि अवैध रूप से भूजल दोहन करने वाली औद्योगिक इकाइयों को चिह्नित कर कार्रवाई के निर्देश भूजल बोर्ड की तरफ से दिए जाने हैं।

वह अगर आवेदन करने वालों की सूची उपलब्ध कराकर यह बताए कि शेष पर कार्रवाई की जानी है तो वह जिला प्रशासन आदि के सहयोग से नियमों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर कार्रवाई शुरू कर देंगे।

एनजीटी ने सरकार को ऐसे क्षेत्रों में भूजल दोहन की अनुमति देने के अधिकार पर रोक लगा दी है, जहां भूजल का स्तर ओवर-एक्सप्लोइटेड (अति दोहन), क्रिटिकल (अधिक दोहन) व सेमी-क्रिटिकल (सामान्य से अधिक दोहन) श्रेणी में पहुंच चुका है।

प्रदेश में ऐसे क्षेत्रों की बात करें तो काशीपुर व खटीमा इसमें शामिल हैं। काशीपुर में भूजल की वार्षिक उपलब्धता का 98.86 फीसद तक दोहन किया जा रहा है, जबकि खटीमा में यह स्तर 83.14 फीसद पहुंच गया है। इसके अलावा हरिद्वार का बहादराबाद वाला हिस्सा भी सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में होने की बात सामने आई है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड के वरिष्ठ वैज्ञानिक रवि कल्याण ने बताया कि भूजल दोहन को नियंत्रित करने के लिए कई दफा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उद्योग विभाग व जिलाधिकारियों को पत्र भेजे जा चुके हैं। इसके बाद भी अवैध दोहन करने वाले प्रतिष्ठानों पर कभी कार्रवाई नहीं की गई।

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