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‘फेक किलिंग’ का धंधा, 7 साल में बीमा कंपनियों से 2 लाख करोड़ ठगे

fake insurance claim
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एक शख्स ने कागजों में नया भाई पैदा करके उसे मार दिया। बिजली का करेंट लगने से मृत एक शख्स को 4 महीने बाद कागजों में दोबारा मार दिया गया। एक शख्स ऑफिस गया था और घर पर उसे मरा बताकर डेथ क्लेम वाले आ गए। ये तीन मामले तो सिर्फ बानगी हैं, असल में ऐसे केसों की संख्या हजारों में है।

असम के बरपेटा गांव के इस्माइल हुसैन और बीमा एजेंट मानिक ने मिलकर फेक किलिंग की एक नई इबारत लिखी। हुसैन ने फर्जी बर्थ सर्टिफिकेट के जरिए कागजों में अपना एक भाई पैदा कर दिया। लोकल स्कूल के हेडमास्टर से उसके सर्टिफिकेट बनवा लिए। बीमा एजेंट मानिक की मदद से हुसैन ने अपने कागजी भाई के नाम पर 25 लाख रुपए का जीवन बीमा करवाया और नॉमिनी में अपना नाम डाल दिया।

फ्रॉड का तरीका-1ः कागजों में भाई बनाया और लाखों का डेथ क्लेम लिया

ब्लूमबर्ग के मुताबिक हुसैन ने बाद में फेक डेथ सर्टिफिकेट से दिखाया कि उसके कागजी भाई की 30 सितंबर 2012 को मौत हो गई। 5 साल बाद हुसैन ने डेथ क्लेम के लिए दावा किया। कागजी भाई के नाम पर इंश्योरेंस कंपनियों से 25 लाख वसूलने के बाद हुसैन भी इंश्योरेंस कंपनियों से जुड़ गया और माणिक के साथ मिलकर गैंग बना ली।

फ्रॉड का तरीका-2: मृतक को दोबारा मारकर 17 लाख का क्लेम लिया

इलेक्ट्रिशियन नोवाब की बिजली लाइन ठीक करते वक्त करेंट लगने से मौत हो गई। उसे कब्रिस्तान में दफ्न कर दिया गया। कुछ दिनों नोवाब की बीवी मफीदा खातून के पास चार शख्स पहुंचे। उन्होंने मफीदा से नोवाब के जीवन बीमा के दस्तावेज मांगे। इन लोगों ने कहा कि उनकी बात मानोगी तो क्लेम का पैसा दोगुना हो जाएगा।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक इस फेक किलिंग गैंग ने मफीदा से पति की वोटर ID, जीवन बीमा की रसीद और कुछ सादे कागजों पर साइन करा लिए। इसके जरिए उन लोगों ने नोवाब के नाम पर 5 अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियों से 6 पॉलिसी खरीदीं। इस गैंग ने 4 महीने बाद नवाब को कागजों में दोबारा मार दिया। अलग-अलग डेथ क्लेम के जरिए करीब 17 लाख रुपए हासिल किए।

फ्रॉड का तरीका-3: डेटा चुराकर जीवित शख्स का डेथ क्लेम कर दिया

जून 2021 की बात है। दिल्ली की सीमा से लगे एक शहर में रहने वाली दीपिका भल्ला के घर पर दो इंश्योरेंस इंवेस्टिगेटर आए। ये लोग उस इंश्योरेंस क्लेम की पुष्टि करने आए थे, जिसका उन्होंने अपने पति की मौत के बाद दावा किया था। यह सुनते ही भल्ला दंग रह गई, क्योंकि पति अभी भी जीवित हैं और सुबह ही वो ऑफिस के लिए निकले थे।

फ्रॉड करने वाले गैंग ने एक सरकारी ऑफिस से बर्थ और डेथ सर्टिफिकेट भी बनवा लिया था। साथ ही उनके नाम पर एक फेक बैंक अकाउंट खोल रखा था। पुलिस ने इस फर्जी क्लेम के पीछे एक आर्गेनाइज्ड गैंग के हाथ होने का शक जताया। फोरेंसिक इंवेस्टिगेटर मयूर जोशी कहते हैं कि यह सब डेटा की चोरी के साथ शुरू होता है। ये गैंग मौजूदा पॉलिसीहोल्डर्स का चुराया हुआ डेटा खरीदते हैं। इसका यूज फेक बैंक अकाउंट खोलने, जाली डेथ सर्टिफिकेट बनाने और इश्योरेंस के क्लेम का दावा करने के लिए करते हैं।

फ्रॉड का तरीका-4ः अलग रह रही पत्नी को मरा बताकर डेथ क्लेम किया

जनवरी 2017 में जब अमीना परबीन अपने माता-पिता के घर पर झाड़ू लगा रही थीं। इसी दौरान एक व्यक्ति उनके घर पर एक फाइल लेकर आया। उस व्यक्ति ने अपने आपको लाइफ इंश्योरेंस का इंवेस्टिगेटर बताया और पैसे के क्लेम का पेपर दिखाने लगा। इंवेस्टिगेटर ने एक पासपोर्ट फोटो, डेथ सर्टिफिकेट दिखाकर अमीना को ही बोला कि क्या आप अमीना को जानती हैं?

इस पर जवाब आया मैं ही अमीना हूं और जीवित हूं। बाद में पता चला कि अमीना से अलग रह रहे पति ने उसके नाम पर एक पॉलिसी करा रखी थी। इसके बारे में अमीना को पता भी नहीं था।

इंश्योरेंस इंवेस्टिगेटर ने अमीना के जीवित पाए जाने के बाद उसके पति के क्लेम को खारिज कर दिया। इसके बाद गांव के बुजुर्गों की एक कमेटी ने अमीना के पति को माफी मांगने और उसे 2 लाख रुपए देने का आदेश दिया।

‘फेक किलिंग’ गैंग के सॉफ्ट टारगेट क्यों हैं जीवन बीमा कंपनियां?

  • साल 2000 तक भारत में इंश्योरेंस के लिए एकमात्र सरकारी कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी LIC ही थी। LIC ने कभी भी बाहरी फ्रॉड वाले दावों के लिए बाहरी जांचकर्ताओं को नहीं नियुक्त किया।
  • 2000 में जब सरकार ने निजी बीमा कंपनियों के लिए मार्केट खोला तो उस दौरान कंपनियों ने वेरिफिकेशन एजेंटों को नहीं रखा। यह सिस्टम काफी हद तक कंपनियों और कस्टमरों, कस्टमरों और एजेंटों और एजेंटों और कंपनियों के विश्वास पर चलता था। गलाकाट स्पर्धा के बीच टार्गेट नहीं पूरा कर पाने पर एजेंट शार्ट कट का सहारा लेने लगे।
  • एजेंट उम्र और आय से जुड़ी आपत्तियों को नजरअंदाज करने लगे। मेडिकल कंडीशन की शर्तों की अनदेखी होने लगी। यदि इस दौरान ऐसे एजेंट पकड़े गए और उन्हें निकाल दिया गया तो वे दूसरी कंपनी में शामिल हो गए। यानी वे अब दूसरी कंपनी के साथ रहकर ऐसा करने लगे।
  • विकसित देशों में जहां इंश्योरेंस फ्रॉड के कानून हैं। जैसे अमेरिका के सभी राज्यों में इंश्योरेंस फ्रॉड को अपराध माना जाता है। वहीं भारत में इंश्योरेंस फ्रॉड के लिए CrPC में कोई विशेष प्रावधान नहीं है। सिर्फ कुछ सेक्शन हैं जिनके तहत इसके कुछ मामले डील होते हैं।

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