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मेहनत कस लोगो के लिए मिसाल है असवाल

[दिलबर सिंह बिष्ट ] रुद्रप्रयाग :यदि आपके अंदर कुछ कर गुजरने की प्रतिभा व ललक हो अपनी संस्कृति को पिरोने, आगे बढाने की तो मनुष्य सात समंदर पार भी क्यूँ न चला जाय वह उसे पिरोने में कोई कोर कसर नही छोड़ सकता।

बता दे कि 26 वर्ष पूर्व अपने भरण पोषण ,आजीविका की तलाश में दिल्ली गए रुद्रप्रयाग ग्राम शिवपुरी पटी बचन्स्यु निवाशी लोक गायक नरेन्द्र सिंह असवाल पुत्र स्व शेर सिंह असवाल विगत 26 वर्ष पूर्व अपनी छोटी सी परिवार की हसरत पूरी करने के लिए दिल्ली किसी अपने परिचित के साथ गये जंहा उन्हें अपनी रोजी रोटी के लिए विजय चौक लष्मी नगर क्लॉथ पैलेस एक कपड़ो की दुकान में नोकरी करनी पड़ी आज भी उसी दुकान में नोकरी कर रहे है ।

नरेंद्र असवाल बताते है कि सुरवाती दौर से उन्हें दिल्ली में अपनी संस्कृति के प्रति कुछ लिखने व दिल्ली में रहने वाले गढ़वाली भाई बन्दों को अपनी संस्कृति को जानने ,बोली भासा को एक दूसरे को जानने के लिए स्टेज सो किये लेकिन सफलता उस तरह की नही मिली जिससे उन्हें गढ़वाली गानों को लिख कर उसे अपने स्वर बध कर अब तक 11 एलबम जिसमें खेरी का दिन,तांबा सारी ढ़ोल, नटखट गोपाल,सोंज्डया समोदरा, बौजी सतेस्वरी, देणा होंया नागराज ,प्यारु बचन्स्यु व जागर मा हरियाली देवी निकाल चुके है।

व्यथित मन से लोक गायक नरेन्द्र असवाल कहते है यदि हमारी उत्तराखंड सरकारें हमारी लोक संस्कृति पर काम कर रहे छोटे व बड़े कलाकारों को आर्थिक रूप से मदद , पहाड़ों में उद्योग धंधे ,छोटी छोटी फैक्टरियों को स्थापित करे तो हम आधे से अधिक युवा ,बुजुर्ग अपनी संस्कृति के लिए काम व रोजगार के लिये बाहर क्यूँ जाएं ,मजबूरी बस इस भीषण दिल्ली की गर्मी, प्रदुषण से अच्छा अपना मुल्क गढ़वाल है

किसका मन करता है यंहा रहने का लेकिन करे क्या कहते है मजबूरी ने हमे जकड़ कर रख दिया है ।फिर वह कहते है हमारी पहाड़ी संस्कृति को आगे बढ़ाने में उन्हें गायन हो या स्टेज सो करना पड़े इसके लिये वह जीवंत पर्यन्त संघर्ष करते रहेंगे।

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