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एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड योजना से देश के 35 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश जुड़े

एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड योजना से देश के 35 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश जुड़ गए। अब केवल असम का इस योजना में शामिल होना शेष है। आशा है कि स्थानीय और विदेशी लोगों की नागरिकता का निर्धारण होने के साथ ही वह भी जनकल्याण की इस उपयोगी योजना से जुड़ जाएगा और उसी के साथ यह पहल पूरी तौर पर साकार हो जाएगी। यह योजना कितनी उपयोगी है, इसे इससे समझा जा सकता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का डिजिटलीकरण होने से करीब 19 करोड़ अपात्र लोगों को चिन्हित करने में मदद मिली। इसके चलते वे हजारों करोड़ रुपये बचे, जो भ्रष्ट तत्वों और बिचौलियों की जेब में जाते थे।

इस योजना से सबसे अधिक लाभ उन मजदूरों को मिल रहा, जो अपने राज्य से बाहर किसी अन्य राज्य में रोजगार के लिए जाते रहते हैं। अब वे कहीं पर भी राशन हासिल कर सकते हैं। अच्छा होता कि गरीबों को राहत और सुविधा देने के साथ भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम लगाने वाली इस योजना में सभी प्रदेश शामिल होने की तत्परता दिखाते, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। जहां कुछ प्रांतों ने ढिलाई का परिचय दिया, वहीं दिल्ली, बंगाल और छत्तीसगढ़ ने कोरोना संकट काल में शुरू की गई इस योजना को अपनाने से ही इन्कार कर दिया। यदि सुप्रीम कोर्ट सख्ती नहीं दिखाता तो शायद वे अब भी आनाकानी करते रहते। इस आनाकानी ने केवल राजनीतिक संकीर्णता को ही रेखांकित नहीं किया, बल्कि यह भी प्रकट किया कि गरीबों के हितैषी होने-दिखने का दावा करने वाले कुछ राजनीतिक दल किस तरह उनके हितों की पूर्ति में बाधक बनते हैं।

एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड योजना ने केवल मजदूरों, कामगारों और गरीब तबके के अन्य लोगों की भौगोलिक बाधा को ही दूर नहीं किया, बल्कि यह भी दर्शाया कि यदि केंद्र और राज्य मिलकर काम करें तो लोक कल्याण के साथ देश के विकास की दिशा में बेहतर ढंग से कार्य कर सकते हैं। यह विचित्र है कि संघीय ढांचे को सशक्त करने की जरूरत जताने वाले दल ही अक्सर उसके खिलाफ काम करते दिखते हैं। जीएसटी लागू होने के बाद जब संघवाद के प्रति और अधिक सहयोग भाव दिखाया जाना चाहिए था, तब कुछ दल अपना अलग राग अलाप रहे हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि कुछ राज्य आयुष्मान योजना और नीट के मामले में किस तरह असहयोग भरे रवैये का परिचय दे रहे हैं?

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