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साइबेरियन पक्षियों को अब नहीं भा रहे उत्तराखंड के नदी तट

पिथौरागढ़ : रूस के साइबेरिया से आने वाले खूबसूरत साइबेरियन पक्षी इस बार उत्तराखंड के नदी घाटी क्षेत्रों में नहीं पहुंचे। सदियों से आ रहे इन मेहमान पक्षियों के आगमन में साल दर साल गिरावट आ रही है। इसका बड़ा कारण पर्यावरण में आ रहा बदलाव माना जा रहा है। अंधाधुंध हो रहे विकास और निर्माण पक्षियों के रास्‍ते में बाधा बन रहे हैं।

साइबेरिया ठंड बढ़ने के कारण आते हैं पक्षी

शीतकाल में रूस के साइबेरिया में तापमान माइनस 50 डिग्री सेंटीग्रेट तक चला जाता है। इस ठंड से बचाव के लिए साइबेरियन पक्षी अफगानिस्तान, पाकिस्तान होते हुए चार हजार किलोमीटर की दूरी तय कर उत्तराखंड के नदी घाटी क्षेत्रों में सदियों से पहुंचते रहे हैं।

पिथौरागढ़ जिले की रामेश्वर घाटी इन पक्षियों का पसंदीदा स्थल रहा है। सरयू और रामगंगा के संगम से तैयार इस घाटी में दिसंबर अंत से मेहमान पक्षियों का आगमन शुरू हो जाता है। फरवरी मध्य में तापमान बढऩे के साथ इनका वापस लौटना शुरू होता है।

दुनिया भर से आते हैं प्रकृति प्रेमी

 

ढाई माह तक गुलजार रहने वाली रामेश्वर घाटी में इन पक्षियों को देखने के लिए दूर दराज से लोग पहुंचते हैं। दुनिया भर के छायाकार भी इन्हें अपने कैमरों में कैद करने के लिए कई-कई घंटे नदी तटों पर डेरा डाले दिखते थे,

लेकिन इस बार पक्षी प्रेमियों को खासी निराशा हाथ लगी है। पर्यावरण बचाने को लेकर सजग ग्रामीण संघर्ष समिति के राजेंद्र भट्ट ने बताया कि इस वर्ष रामेश्वर घाटी क्षेत्र में पक्षियों का आगमन नहीं के बराबर हुआ।

पर्यावरणविद इसे पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में देख रहे हैं। सड़कों के निर्माण के दौरान निकलने वाले मलबे को नदी घाटी क्षेत्रों की ओर धकेल दिए जाने से इन पक्षियों के प्राकृतिक वास स्थलों के प्रभावित होने को भी एक कारण माना जा रहा है।मुद्दे पर चर्चा को भारत में जुटे 110 देशों के प्रतिनिधि

 

जैव विविधता पर दुनिया का पहला सम्मेलन सोमवार को गुजरात के गांधीनगर में शुरू हुआ। इस सम्मेलन में दुनियाभर के 1200 से ज्यादा प्रतिनिधि प्रवासी जीवों की संख्या में आ रही गिरावट और जैव विविधता को बचाने के मुद्दों पर चर्चा करेंगे।

 

ये चीजें बन रही पक्षियों के मार्ग की बाधा

पर्यावरणविद धीरेंद्र जोशी ने बताया कि साइबेरिया से आने वाले पक्षियों के मार्ग में तमाम तरह के अवरोध खड़े हो रहे हैं। मोबाइल टावर, बिजली की लाइनों के साथ ही नई सड़कों के निर्माण में भारी मशीनरी का उपयोग और मलबा नदी तटों की ओर फेंके जाने ऐसे संभावित कारण हैं

प्रवासी पक्षियों के वास स्थल को सुरक्षित रखकर ही इसे बचाया जा सकता है, अन्यथा की स्थिति में पूरी जैव विविधता प्रभावित होगी। वहीं वनक्षेत्राधिकारी दिनेश जोशी ने कहा कि प्रवासी पक्षियों के कम आने की सूचना क्षेत्र के लोगों से मिली है। इसकी सूचना उच्चाधिकारियों को दी जाएगी।

 

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