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बेरोजगार न होते तो क्या हम नगर निगम की ड्राइवरी करते

देहरादून, बेरोजगार न होते तो क्या हम नगर निगम की ड्राइवरी करते। वो भी कूड़ा ढोने वाली गाड़ी की। किसी गांव वाले या रिश्तेदार की नजर पड़ गई तो क्या सोचेगा। इसलिए तय कर लिया कि नौकरी तो करेंगे, मगर कूड़े की गाड़ी के स्टेयरिंग पर हाथ नहीं रखेंगे।

चेले भी तो बेरोजगार हैं। किस दिन काम आएंगे वो सब। वे बेचारे दो-चार हजार पा जाएंगे तो अपना कौन सा बहुत घाटा हो जाएगा। शहर में कूड़ा उठान करने वाली गाड़ि‍यों के ड्राइवर आजकल इसी फार्मूले पर काम कर रहे हैं। गुरु दाम ले रहे और चेले काम कर रहे।

फार्मूला भी तो नगर निगम से ही मिला है। यहां ठेकेदार भी तो यही करते हैं। शहर में निर्माण कार्य का ठेका ले लिया और कमीशन काटकर आगे सबलेट कर दिया। न मेहनत की न ही भागदौड़। खर्च धेला न हुआ और घर बैठे बिठाए कमाई-धंधा भी बढ़ि‍या चल रहा है।

चल भाई, गाड़ी साइड लगा और पेपर निकाल। ये डीएल में किसकी फोटो लगी है, तुम्हारी तो नहीं लग रही। इंश्योरेंस का कागज भी फटा हुआ है। समझ में नहीं आ रहा है कि सही भी है या नहीं।

सीट बेल्ट क्यों नहीं लगाई। न जाने ऐसी कितनी कमियां गिनाता हुआ होमगार्ड टू स्टार वाले साहब के पास पहुंचा। बोला कि साहब इस पर तो तगड़ा जुर्माना काटना पड़ेगा। यह तो यातायात के नियमों का खुला उल्लंघन कर रहा है। सहारनपुर निवासी रोहित कुमार आशारोड़ी पर इतनी तगड़ी पुलिस चेकिंग से घबरा गए।

रोहित कुछ सोच पाते कि उसी अंदाज में एक और गाड़ी रोकी गई। गाड़ी हरियाणा नंबर की थी। उस शख्स के साथ भी रोहित जैसा ही सलूक। फिर एक और गाड़ी रोकी गई जो उत्तर प्रदेश नंबर की थी। अब रोहित की समझ में आ गया कि ‘गुनाहगार’ वही गाड़ियां हैं जो उत्तराखंड के नंबर की नहीं हैं।

 

शायरी नहीं संदेश भी

 

यूं तो बस, ट्रक, लोडर आदि के पीछे लिखी शायरी को सड़कछाप शायरी बताया जाता है, लेकिन इशारों-इशारों में अक्सर ये शायरी लोगों को जागरूक भी कर रही है। शहरों में गाडिय़ों के हॉर्न की आवाज अमूमन लोगों की बेचैनी बढ़ा देती है और ट्रैफिक जाम में फंसे लोगों को लगता है कि जल्दी से रास्ता खुले और वह मंजिल तक पहुंचे। इसलिए हरा सिग्नल मिलते ही रफ्तार की होड़ लेते वाहन चालक हादसों को न्योता देते हैं।

ऐसे ही लोगों को सचेत करने के लिए ट्रक के पीछे लिखा दिखता है कि ‘धीरे चलाएगा तो बार-बार मिलेगा, तेज चलाएगा तो हरिद्वार मिलेगा।’ यानी साफ-साफ संदेश दिया जा रहा कि तेज रफ्तार से आप मौत को दावत दे रहे हैं। इसलिए बेहतर होगा कि वाहन की रफ्तार पर काबू रखिए। अगली बार भी तो मिलना है जनाब। ऐसी ही संदेशपरक शायरी से हम लोगों को सीख लेने की जरूरत है।

 

गुम हुई तांगा सवारी

 

देहरादून का घंटाघर, रेलवे स्टेशन और राजपुर रोड। एक जमाने में तांगे की सवारी के लिए खासी चर्चित मानी जानी थी। वर्ष 1971 में आई फिल्म पतंगा में शशि कपूर व अभिनेत्री विमी की दून रेलवे स्टेशन पर मुलाकात और राजपुर रोड पर तांगे की सवारी के साथ फिल्माया गया दृश्य आज भी दूनवासियों के जेहन में ताजा है। गुजरा दौर आज भी दूनवासियों को याद आता है।

उस दौर में ये तांगे एक आने से लेकर चार आने तक में सवारियों को दूर-दूर तक ले जाया करते थे। आज ऑटो-रिक्शा, विक्रम ने इनकी जगह ले ली है। वो दौर बदला जरूर, लेकिन नया दौर अपने साथ प्रदूषण भी लाया।

तांगे की सवारी की सबसे बड़ी खासियत उनका प्रदूषण से मुक्त होना मानी जाती थी। एक तांगा वास्तव में दो गाड़ियों का बोझ ढो सकता था। इस तरह तांगों के समाप्त होने का अर्थ है…एक युग का खत्म होना।

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