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पेट संबंधी बीमारियों के लिए रामबाण काफल

हल्द्वानी : पेट से जुड़ी बीमारियों में रामबाण कहे जाने वाले पहाड़ी फल काफल की प्रजातियां बढ़ाने में वन अनुसंधान केंद्र जुटा है। उत्तराखंड में इसकी एक ही प्रजाति पाई जाती है।

जबकि उत्तर-पूर्वी राज्यों में ज्यादा। लिहाजा, इन राज्यों की तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। रानीखेत में शुरू किया पहला प्रयोग धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। पौधे अपनी जड़ें जमा चुके हैं। हालांकि फल आने पर ही रिसर्च की सफलता का पता चलेगा।

पहाड़ के जंगलों में मिलने वाले काफल को पनपने के लिए ठंडा वातावरण चाहिए। खट्टा-मीठा यह रसीला फल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का जरिया भी बन रहा है। सीजन में काफल 400 रुपये किलो तक बिकता है। प्रदेश में फिलहाल इसकी एक ही प्रजाति मिलती है।

जो कि मेघालय में होने वाले काफल से काफी छोटी है। जिस वजह से रानीखेत में बाहर की प्रजाति पर रिसर्च चल रहा है। अगर वन अनुसंधान केंद्र की टीम इसमें कामयाब होती है तो भविष्य में इस बाहरी प्रजाति का फैलाव भी किया जाएगा। इससे पूर्व चिनार व ट्यूलिप संरक्षण को लेकर बेहतर रिजल्ट मिलने से संभावनाएं काफी ज्यादा है।

वन अनुसंधान केंद्र बांज प्रजातियों को लेकर भी रिसर्च में जुटा है। वन संरक्षक अनुसंधान संजीव चतुर्वेदी ने बताया कि अगले माह टीम सिक्किम व अरुणाचल जाएगी। वहां मिलने वाली बांज प्रजातियों की जानकारी लेकर उत्तराखंड में काम होगा।

संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक अनुसंधान ने बताया कि काफल की प्रजाति बढ़ाने का प्रोजेक्ट लंबे समय से चल रहा है। हमारा फोकस देश के हिमालयी राज्यों में मिलने वाली प्रजातियों का संरक्षण करना है। उत्तराखंड और इन प्रदेशों की भौगोलिक व पर्यावरणीय परिस्थितियों में काफी समानता है।

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