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कैसे हुई 98 आजीवन कैदियों की रिहाई

देहरादून, हरिद्वार जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक कैदी की अपील से महानिरीक्षक कारागार कार्यालय पशोपेश में है। सूचना के अधिकार में कैदी की अपील खारिज कर चुके कारागार के अधिकारियों के सामने अब उन 98 कैदियों की रिहाई का परीक्षण कराने की चुनौती खड़ी हो गई है, जिन्हें जनवरी 2009 से मई 2019 के बीच रिहा किया गया।

राज्य सूचना आयोग ने महानिरीक्षक कार्यालय के अपीलीय अधिकारी/वरिष्ठ वित्त अधिकारी को आदेश दिए हैं कि या तो वह नियमानुसार अपीलार्थी कैदी को बुलवाकर उसका पक्ष जानें, या स्वयं हरिद्वार जेल में जाकर सुनवाई करें।

 

यह प्रकरण हरिद्वार जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी कैलाश चंद्र वर्मा से जुड़ा है। कैदी का कहना है कि वह 17 साल से सजा काट रहे हैं और इस अवधि में सरकार ने जब 98 आजीवन कैदियों को रिहा किया तो इसमें उनका नाम शामिल क्यों नहीं किया गया।

इसी बात को लेकर कैलाश ने कारागार मुख्यालय से रिहा किए गए कैदियों के नाम, काटी गई सजा अवधि, रिहाई के समय उनके स्वास्थ्य की स्थिति, रिहाई को लेकर डीएम, एसएसपी की संस्तुति की सूचना मांगी थी। साथ ही उत्तराखंड दंडादेश निलंबन नियमावली के शासनादेश संशोधन की प्रतिलिपि की मांग भी की थी। कारागार मुख्यालय के लोक सूचनाधिकारी व अपीलीय अधिकारी के स्तर से सूचना न मिलने पर कैदी कैलाश चंद्र ने सूचना आयोग में अपील की।

प्रकरण की सुनवाई करते हुए राज्य सूचना आयुक्त चंद्र सिंह नपलच्याल ने पाया कि विभागीय अपीलीय अधिकारी ने इन सूचनाओं को तृतीय पक्ष की सूचना बताया और व्यापक जनहित न देखते हुए अपील खारिज कर दी।

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