अल्मोड़ा

उत्‍तराखंड में है एशिया का सबसे बड़ा सेब बागान

अल्मोड़ा: क्‍या आप जानते हैं कि एशिया का सबसे बड़ा एप्‍पल गार्डन अल्‍मोड़ा जिले में है? जी हां अल्‍मोड़ा जिले के चौ‍बटिया में करीब 235 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला सेब का बागान एशिया का सबसे बड़ा एप्‍पल गार्डन है। लेकिन विभागीय अधिकारियों की उपेक्षा और अनदेखी के कारण साल दर साल इस बागान का उत्‍पादन लगातार गिरता गया।

नतीजा आज इसके अस्तित्‍व पर ही संकट खड़ा हो गया है। अब बागान को पुनर्जीवित करने के बजाय शासन की मंशा इसे अनुसंधान केंद्र बनाने पर है। यह सब कुछ तब हुआ जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक रीढ़ बागवानी और इसके विकास की तमाम संभावनाओं के देखते हुए उद्यान निदेशालय को लखनऊ के बजाय रानीखेत में स्थापित किया गया था।

 

कभी रसीले सेबों से लकदक रहता था बागान

 

चौबटिया गार्डन का सेब उत्पादन क्षेत्र घटकर अब 106.91 हेक्टेयर रह गया है। उसमें भी मात्र 60.20 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सेब उत्पादन किया जा रहा है। एक दौर था जब 235 हेक्टेयर में विभिन्न प्रजातियों के पेड़ सीजन में 500 कुंतल से ज्यादा सेब की पैदावार देते थे।

वर्तमान में यहां फल वृक्ष तो लगभग 17 हजार हैं मगर उत्पादन खिसक कर 20 से 30 कुंतल के बीच ही सिमट गया है। 2019 में मात्र 27 कुंतल उत्पादन बागान की बदहाली बयां करने को काफी है।

रानीखेत उपमंडल बागवानी के लिहाज से बेहद उर्वर है। तत्कालीन पर्वतीय विकास मंत्री गोविंद सिंह माहरा व नित्यानंद कांडपाल ने उद्यान निदेशालय व अनुसंधान केंद्र को लखनऊ से चौबटिया स्थापित कराने के लिए संघर्ष किया।

ताकि सेब उत्पादन को पहाड़ की आर्थिकी से जोड़ स्वरोजगार मुहैया कराया जा सके। 1955-56 में चौबटिया में उद्यान निदेशालय ने मूर्तरूप ले भी लिया। फिल्मकारों को भी यह एप्पल गार्डन भाने लगा। अविभाजित उत्तर प्रदेश तक हालात अपेक्षाकृत ठीक रहे।

रानीखेत के चौबटिया क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी आदि पहलुओं को नजरअंदाज कर एक एजेंसी से अमेरिकन सेब का करार ही था कि एशिया के नंबर वन एप्पल गार्डन का बुरा दौर शुरू हो गया।

हिमालयी रेड डिलिसियस के पेड़ रातों रात साफ कर अमेरिकन सेबों की पौध लगा दी गई। मगर अब वही पैदावार का रोना रोया जा रहा है। तब ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक डीडी जोशी ने माना था कि अमेरिकन प्रजातियां उम्मीद से कम फल देने लगी हैं।

उत्तर प्रदेश के दौर में आधे से ज्यादा क्षेत्रफल में हिमालयन रेड डिलिसियस, गोल्डन वैली, फेनी, रायमर, रेड गोल्ड सरीखी पर्वतीय सेब प्रजातियों के अनगिनत पेड़ बंपर पैदावार देते थे। यही वजह रही कि हिमाचल, अरुणाचल आदि ही नहीं बल्कि कश्मीर तक चौबटिया बागान की सेब प्रजातियों के रूट स्टॉक व यहीं तैयार पौधे ले जाए गए।

सेब उत्पादन इन राज्यों की आर्थिकी का आधार भी बने, लेकिन चौबटिया की साख गिरती गई। किसी दौर में चौबटिया बागान में गजक की मिठास वाले रेड डिलिसियस के साथ ही खट्टी मीठी सेब प्रजातियां सैलानियों की पसंद हुआ करती थीं। अब सब चौपट हो गया है।

विधायक व उपनेता प्रतिपक्ष करन माहरा ने बताया कि उत्तराखंड गठन के बाद से किसी भी सरकार ने चौबटिया गार्डन पर ध्यान नहीं दिया। बागवानी जड़ी बूटी व फल उत्पादन ही पर्वतीय क्षेत्र में बड़ा साधन बन सकता है। वर्तमान राज्य सरकार ने यहां गार्डन के बजाय रिसर्च सेंटर की तैयारी पूरी कर ली है।

यह पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बड़ा झटका है। स्व. गोविंद सिंह माहरा व स्व. नित्यानंद कांडपाल के संयुक्त प्रयासों से लखनऊ से उद्यान निदेशालय को चौबटिया स्थापित कराया गया था। ताकि पहाड़ वालों की आर्थिकी से जोड़ा जा सके। अगर अभी भी चौबटिया एप्पल गार्डन का उद्धार किया जाता है तो यह आजीविका, आर्थिकी, पर्यटन आदि के लिए मील का पत्थर साबित होगा।