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उत्‍तराखंड में सेवा के बगैर मेवा खाने की तैयारी में शिक्षक

देहरादून, 80 फीसद से ज्यादा भूभाग दुर्गम दूरदराज पहाड़ी क्षेत्रों में प्राथमिक से लेकर माध्यमिक तक सरकारी स्कूल खुले, भवन बने, ठेकेदार फूले-फले, लेकिन मास्साब वहां का रुख करने को तैयार नहीं। यह सबकुछ पलायन रोकने की चिंता के बीच बदस्तूर चल रहा है। शिक्षकों को नई नियुक्ति और पदोन्नति, दोनों ही वक्त पर पहाड़ चढ़ाने को नियम-कानून मौजूद हैं।

सरकार ने इंटर कॉलेजों के लिए प्रवक्ता पदों पर नई नियुक्तियां कीं। इन्हें पहली तैनाती पर दुर्गम भेजा गया। नई तैनाती वाले भी दूरदराज जाना नहीं चाहते। ऐसे में तंत्र की खामियों को खंगालने का काम शुरू।

कार्यभार ग्रहण किए बगैर ही निकाल दिए सात महीने। सुगम में तैनाती की जुगत भिड़ाने का सिलसिला निदेशालय से लेकर सचिवालय तक जारी है। सेवा के बगैर मेवा खाने की तैयारी है। रोजगार के लिए हल्ला मचाने वालों की कारस्तानी से हाकिम भौंचक हैं। पानी सिर से गुजरने की नौबत है।

प्रदेश के 20 ब्लॉकों और 15 विधानसभा क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज नहीं हैं। प्रचंड बहुमत की सरकार पर माननीयों का भारी दबाव। मांग वहीं पुरानी, कुछ भी करो, नया कॉलेज खोलो। जगह और जमीन दोनों सुझा रहे हैं। तर्क भी दनादन। मुश्किल ये है कि सरकार फैसला ले भी तो कैसे। सरकारी डिग्री कॉलेजों की संख्या बढ़कर 105 हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या में कॉलेजों के पास अपने भवन तक नहीं हैं।

बदहाली का रोना यहीं नहीं थम रहा। नौबत कॉलेज बंद होने की है। बड़ी संख्या में डिग्री कॉलेजों में छात्रसंख्या 200 तक सिमट गई है। डिग्री शिक्षकों की भारी तनख्वाह और छात्र संख्या सिकुड़ रही है।

विभागीय मंत्री डॉ धन सिंह रावत चिंतित। फरमान सुना दिया। 200 से कम छात्रसंख्या वाले कॉलेज बंद होंगे या दूसरे कॉलेजों में मर्ज होंगे। माननीय बेचैन। मुखिया तक शिकायत दर्ज कराई। नया फरमान जारी हुआ, बंद नहीं होंगे कॉलेज। मामला शांत है।

सरकार जांच बैठा दे तो किसकी मजाल कि चैन की सांस ले सके। सूबे में एक विश्वविद्यालय ऐसा भी है जो कैसी भी जांच हो, इठला उठता है। तकनीकी विश्वविद्यालय की इस कुव्वत को सब पहचानते हैं। विश्वविद्यालय में अहम ओहदों पर नियमों-कानूनों को दरकिनार कर बेधड़क आउटसोर्स से नियुक्तियां कर दी गईं। मामला उधड़ा तो सरकार ने जांच बैठा दी।

इसके बाद पीएचडी बांटने का ठेका ऐसा लिया कि पूरा शिक्षा जगत आंख फाड़कर देखता रह गया। घपले की शिकायत पर राजभवन के रिमाइंडर-दर-रिमाइंडर के बाद आखिरकार शासन ने जांच बैठा दी। इस बीच ऑडिट रिपोर्ट आई, फिर गड़बडिय़ों से पर्दा उठ गया।

बदनामी ढांपने को सरकार ने जांच के आदेश फिर दे दिए। ताजा मामले में कॉलेजों को संबद्धता देने में घपला पकड़ा गया। कार्यपरिषद के दो सदस्यों ने ही इस मामले में बैठक के कार्यवृत्त पर ही सवाल उठा दिए हैं। फिर जांच बैठाई जा चुकी है।

आखिर कैसे मिले मुखिया

 

देर-सबेर हर किसी के दिन बहुरते हैं, लेकिन उत्तराखंड में सरकारी इंटर कॉलेजों के अच्छे दिन आते ही नहीं हैं। जी हां, यह कड़वा सच है। इन कॉलेजों को मुखिया नहीं मिलते। प्रधानाचार्य भेजने के चाहे जितने बंदोबस्त करो, गिलास हमेशा ही आधा खाली रहता है।

इस समस्या की वजह भी बड़ी विकट है। प्रदेश में सरकारी इंटर कॉलेजों की तादाद है 1350, जबकि हाईस्कूलों की संख्या महज 950 है।

व्यवस्था ये है कि हाईस्कूलों के मुखिया यानी हेडमास्टर ही पदोन्नत होकर इंटर कॉलेज प्रधानाचार्य बन सकते हैं। पढ़ाई का माहौल बनाने की बात हो या अनुशासन, या बच्चों का चहुंमुखी विकास, कॉलेज में प्रधानाचार्य होने पर ही यह मुमकिन होता है।

500 कॉलेजों में स्थायी प्रधानाचार्य न हों तो हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में महकमे ने रिक्त पदों पर सीधी भर्ती का फार्मूला सुझाया है। यह प्रस्ताव शासन में अरसे से फाइलों में दबा है।

 

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