देश/प्रदेश

उत्‍तराखंड में कांग्रेस में अंदरूनी झगड़े से भाजपा को सुकून

देहरादून,कांग्रेस हाईकमान का सख्त रुख भी उत्तराखंड में पार्टी के भीतर आपसी खींचतान, एकदूसरे पर आरोपों-प्रत्यारोपों और अनुशासनहीनता पर रोक लगा पाने में अब तक नाकाम साबित हुआ है। पार्टी पर हावी होने की बढ़ती होड़ और महत्वाकांक्षा एकजुटता की कोशिशों पर भारी पड़ी हैं। प्रमुख विपक्षी दल की इस कमजोरी ने सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा को ज्यादा सुकून का अहसास कराया है।

 

प्रदेश में पहले 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार से कांग्रेस सबक नहीं ले पाई है। भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास सबसे मजबूत हथियार एकजुटता के साथ विरोधियों पर प्रहार करने का रहा है। एकजुटता में कमी ही पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

इस चुनौती से प्रदेश नेतृत्व पार नहीं पा सका है। राष्ट्रीय और प्रांतीय नेतृत्व के आह्वान पर अब तक पार्टी के जितने भी बड़े कार्यक्रम हुए हैं, उनमें गुटीय खींचतान का साया रहा।

सड़क से लेकर सदन तक पार्टी के संघर्ष पर भी इसका असर साफ दिखाई दिया है। बीती 28 दिसंबर को देहरादून में संविधान बचाओ देश बचाओ रैली को लेकर विवाद कार्यकर्ताओं से बढ़कर विधायकों को जद में ले चुका है।

एक खेमे के विधायकों ने गाहे-बगाहे प्रदेश संगठन और विधानमंडल दल के नेतृत्व को निशाने पर लिया तो जवाब में दूसरा खेमा भी तीखे हमले बोलने में पीछे नहीं रहा। इस पर आगे विराम लगेगा, फिलहाल सूरतेहाल ऐसा संकेत नहीं दे रहे।

माना जा रहा है कि मिशन 2022 की कदम बढऩे के साथ खींचतान और बढ़ सकती है। हाईकमान प्रदेश कांग्रेस की नई कमेटी की घोषणा को लेकर मचे घमासान को थाम चुका है, साथ में वर्चस्व कायम रखने को आमने-सामने रहने पर आमादा नेताओं को सख्त हिदायत दी जा चुकी है।

चूंकि ये सख्त हिदायत कभी अमल में लाई ही नहीं गई, लिहाजा खींचतान बदस्तूर हावी है। इस संबंध में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि अंतर्विरोध और मत-मतांतर पार्टी के अंदरूनी मजबूत लोकतंत्र का नमूना हैं। उन्होंने दावा किया कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी के सभी नेता एकजुट और ताकत के साथ प्रदर्शन करेंगे।

विशेष