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उत्तराखंड के इन गांवों को वन कानूनों की बंदिशों से आजादी

देहरादून, कार्बेट टाइगर रिजर्व के ईको सेंसिटिव जोन की जद में आ रहे 47 गांवों को वन कानूनों की बंदिशों से अब आजादी मिल गई है। कैबिनेट ने कार्बेट रिजर्व के चारों ओर प्रस्तावित ईको सेंसिटिव जोन की परिधि 10 से घटाकर 7.96 किमी करने के साथ ही जोन से सभी गांवों को बाहर करने के संशोधित प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। अब यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। फिर केंद्र ही कार्बेट के ईको सेंसिटिव जोन की अंतिम अधिसूचना जारी करेगा।

पूर्व में कार्बेट टाइगर रिजर्व के चारों तरफ 10 किमी की परिधि में आने वाले क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन परिभाषित कर दिया गया था। इसके चलते ढेला गांव के अलावा तैडिय़ा, पांड समेत 46 चक (छोटी-छोटी बसागत वाले गांव) में लोगों की दुश्वारियां बढ़ गई थीं।

एक तो इन क्षेत्रों में वन्यजीवों का खौफ और उस पर वन कानूनों की बंदिशें ऐसी कि न तो तेज रोशनी की जा सकती थी और न तेज आवाज में रेडियो ही बजाया जा सकता था।

साथ ही इन गांवों में मूलभूत सुविधाएं भी पसर नहीं पा रही थीं। सूरतेहाल, इन गांवों के लोग उन्हें ईको सेंसिटिव जोन से बाहर करने की मांग उठा रहे थे।

इस सबको देखते हुए पूर्व में कैबिनेट ने कार्बेट के ईको सेंसिटिव जोन का संशोधित प्रस्ताव केंद्र को भेजने का निर्णय लिया। इसके मद्देनजर कैबिनेट की सब कमेटी गठित की गई थी। कमेटी की सिफारिशों पर हुई कैबिनेट की बैठक में मंथन हुआ और फिर कार्बेट टाइगर रिजर्व के प्रस्तावित ईको सेंसिटिव जोन के संशोधित प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई।

अब 1288.31 वर्ग किलोमीटर में फैले कार्बेट रिजर्व के प्रस्तावित ईको सेंसिटिव जोन का क्षेत्रफल 377.8169 वर्ग किमी होगा। कार्बेट नेशनल पार्क व सोनानदी वन्यजीव बिहार के चारों तरफ का क्षेत्र ईको सेंसिटिव जोन कहलाएगा।

चारों तरफ की परिधि की सीमा भी 7.96 किमी की गई है। इसके दायरे से ढेला गांव और सभी 46 चक को बाहर कर दिया गया है। ईको सेंसिटिव जोन की केंद्र से अधिसूचना होने के बाद इन सभी गांवों को वन कानूनों की बंदिशों से मुक्ति मिल जाएगी।

सेंसिटिव जोन में गतिविधियां प्रतिबंधित

वाणिज्यक खनन, अत्यधिक और गंभीर रूप से प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग, जलौनी लकड़ी का वाणिज्यिक उपयोग, जल निकायों व स्थलीय क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट फेंकना, पॉलीथिन का प्रयोग।

 

विनियमित

पेड़ कटान, नई आरा मशीनों की स्थापना, नए होटल व रिसॉर्ट (जोनल मास्टर प्लान के अनुरूप), भू उपयोग में परिवर्तन, जलस्रोतों का वाणिज्यिक उपयोग, जल विद्युत परियोजनाएं, विद्युत लाइनें, होटल-लॉज के परिसर फैंसिंग, वन मार्गों का चौड़ीकरण, विदेशी प्रजातियों का रोपण, वायुयान अथवा गर्म हवा के गुब्बारों की उड़ान, ढलानों व नदी किनारों का संरक्षण, रात्रि में वाहनों का आवागमन।

अनुमन्य

घर निर्माण या मरम्मत को खुदाई और निजी आवास के लिए टाइल्स व ईंटों का प्रयोग, कृषि और बागवानी, वर्षा जल संचयन, जैविक खेती, अक्षय ऊर्जा स्रोत का उपयोग, हरित प्रौद्योगिकी।

 

अब सामने आएगी वन पंचायतों की असल तस्वीर

देश में वन पंचायतों की एकमात्र व्यवस्था वाले राज्य उत्तराखंड में वन पंचायतों की असल तस्वीर अब सामने आएगी। अब तक गठित 12089 वन पंचायतों के जिम्मे सात हजार वर्ग किमी से ज्यादा वन क्षेत्र है, मगर इनके सीमांकन को लेकर अक्सर सवाल भी उठते रहे हैं।

इसे देखते हुए वन महकमे ने प्रदेश में राजस्व विभाग द्वारा सर्वे आफ इंडिया के जरिये कराए जाने वाले सर्वे में वन पंचायतों के सीमांकन के बिंदु को भी शामिल कराया है। सर्वे में प्रत्येक वन पंचायत का क्षेत्र स्पष्ट होने से वहां माइक्रो प्लान तैयार करने में मदद मिलेगी।

वनों के संरक्षण के मद्देनजर उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आजादी से पूर्व 1932 में वन पंचायतों के गठन की कवायद शुरू हो गई थी। वर्तमान में प्रदेश में 12089 वन पंचायतें अस्तित्व में हैं, जिनके जिम्मे 7350.85 वर्ग किलोमीटर जंगल है। इसमें 348.138 वर्ग किमी आरक्षित वन क्षेत्र भी है। इन वन क्षेत्रों का प्रबंधन पूरी तरह से वन पंचायतों के पास है।

हालांकि, वहां वन प्रबंधन की योजनाएं बनाने में वन विभाग ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फिर चाहे वह वन प्रबंधन के मद्देनजर बड़ी कार्ययोजना हों या फिर सूक्ष्म कार्ययोजना यानी माइक्रो प्लान। बावजूद इसके वन पंचायतों के अधीन वन क्षेत्रों के सीमांकन को लेकर कई मर्तबा विवाद की नौबत आती रही है।

कई वन पंचायतों के अधीन और वन विभाग के अधीन वन क्षेत्र आपस में जुड़े हैं। ऐसे में ये पता नहीं लग पाता कि कौन क्षेत्र किसके अधीन है। नतीजतन, वहां वन प्रबंधन की योजनाएं भी ठीक से आकार नहीं ले पा रही हैं। ऐसे में जरूरी है कि वन पंचायतों के अधीन वन क्षेत्र का ठीक से सीमांकन हो। इसी के दृष्टिगत अब राजस्व विभाग द्वारा कराए जाने वाले सर्वे में वन पंचायतों के सीमांकन को भी शामिल कराया गया है।

वन विभाग के मुखिया प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जय राज कहते हैं कि वन पंचायतों में वन प्रबंधन के लिए माइक्रो प्लान वन विभाग तैयार करता है। विभाग ही वन पंचायतों को बजट भी मुहैया कराता है।

ऐसे में यह साफ होना आवश्यक है कि किस वन पंचायत की सीमाएं कहां तक है। उन्होंने कहा कि अब राजस्व विभाग के सर्वे में वन पंचायतों को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।

उत्तराखंड में क्षेत्र विशेष को ‘वन’ के रूप में नए सिरे से परिभाषित करने को सरकार नए मापदंडों के मंथन में जुटी है। कैबिनेट की बैठक में इसे लेकर चर्चा हुई, लेकिन इसे स्थगित कर अगली बैठक में रखने का निर्णय लिया गया। अब गुरुवार को होने वाली कैबिनेट में इस संबंध में विचार किया जाएगा।

 

सरकार ने पिछले वर्ष जून में वन की परिभाषा के मानक का निर्धारण किया। इसमें राज्य व केंद्र के मौजूदा कानून के तहत वन के रूप में अधिसूचित समस्त क्षेत्रों को वन माना गया। परिभाषा दी गई कि वन क्षेत्र के अलावा राज्य के किसी भी राजस्व रिकार्ड में वन के रूप में वास्तव में अधिसूचित या उल्लिखित वन क्षेत्र, जो 10 हेक्टेयर अथवा उससे अधिक के सघन क्षेत्र और गोलाकार डेंसियोमीटर से मापने पर वितान घनत्व 60 फीसद से अधिक हो, उसे वन माना जाएगा।

यह भी कहा गया कि किसी भी स्वामित्व के अन्य क्षेत्र, जिसमें 10 हेक्टेयर या इससे अधिक सघन क्षेत्र के साथ 75 फीसद से अधिक देशी वृक्ष प्रजातियां हों और वितान घनत्व 60 फीसद से अधिक हो, को भी वन माना जाएगा। अलबत्ता, किसी भी आकार और प्रजातियों के बागीचों को वन की परिभाषा से बाहर रखा जाएगा। इसके आदेश भी जारी कर दिए गए थे।

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