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आठ साल से ठप पड़े आइस रिंक की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मौन

देहरादून: दून में बना दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा आइस रिंक पिछले आठ साल से धूल फांक रहा है। आइस रिंक में बर्फ तैयार करने वाली मशीनों ने दम तोड़ दिया, वहीं घास ने रिंक पर मजबूत पकड़ बना ली है। वहीं, जिम्मेदार इस दिशा में मौन बैठे हैं।

 

सूबे में आइस स्पोर्ट्स को नई ऊंचाई देने के लिए 65 करोड़ रुपये की लागत से बनाए गए आइस रिंक का कोई सुधलेवा नहीं है। यह आइस रिंक सरकार के लिए इनकम का साधन बन सकता था।

विंटर गेम्स के खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए यह रिंक अहम साबित हो सकता था, लेकिन यह सोच जिम्मेदारों में नहीं दिखी।

इतना ही नहीं आइस रिंक के रखरखाव में भी जिम्मेदार नाकाम साबित हुए। वहीं खेल मंत्री ने भी इसकी सुध लेना जरूरी नहीं समझा। अब मुख्यमंत्री ने आइस रिंक को पीपीपी मोड पर देकर संचालित कराने की बात कही है। इस पर कवायद शुरू होगी या नहीं यह तो समय ही बताएगा।

लंबे इंतजार के बाद ही सही, लेकिन अब प्रदेश के पहले बालिका स्पोर्ट्स कॉलेज के वजूद में आने की उम्मीद जगी है। बाकायदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इसे रुद्रपुर में बनाने की घोषणा की है।

दरअसल, सूबे के पहले महाराणा प्रताप स्पोट्र्स कॉलेज की तरह बालिका स्पोट्र्स कॉलेज की परिकल्पना एक दशक पहले की गई थी। इसके लिए प्रयास भी हुए, लेकिन बात नहीं बनी।

इस बीच सरकार ने अगस्त्यमुनि, हरिद्वार और पिथौरागढ़ में एथलेटिक्स, हॉकी व बॉक्सिंग के बालिका खेल छात्रावास खोले। साथ ही पिथौरागढ़ में स्पोर्ट्स कॉलेज वजूद में आया। वहीं, बालिका स्पोर्ट्स कॉलेज की कवायद गुम होकर रह गई।

इससे खेलों में अपना भविष्य देख रही बालिकाओं को निराशा हुई। अब मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद रुद्रपुर में इसे बनाने की तैयारी है। स्पोट्र्स कॉलेज में एक साथ कई खेलों के प्रशिक्षण की सुविधा बालिका खिलाडिय़ों को मिलेगी। जिससे बालिकाओं को उच्च स्तरीय प्लेटफॉर्म मिलेगा।

राष्ट्रीय खेल 2021 व ओलंपिक 2024 में उत्तराखंड की झोली में पदक डालने वाले खिलाड़ी तैयार करने के निर्देश मुख्यमंत्री ने खेल विभाग को दिए थे। उन्होंने मंच से घोषणा की थी कि अगर इसके लिए सात समंदर पार से भी कोच लाने पड़ें तो लाए जाएं। इसके बाद जिम्मेदारों ने सीएम की घोषणा को गंभीरता से नहीं लिया।

 

इसलिए इस मामले में अब तक की कार्रवाई शून्य है। यह स्थिति तब है, जब 2021 में उत्तराखंड में राष्ट्रीय खेल होने हैं। इसके लिए एक साल से भी कम समय शेष है। अब सवाल यह है कि कब सात समंदर पार से विशेष प्रशिक्षक आएंगे। कब वह खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करेंगे।

विभागीय लापरवाही की हद तो यह है कि किस खेल के प्रशिक्षक को लाना है अभी तक इसकी सूची भी तैयार नहीं है। ऐसे में खिलाडिय़ों से पदक की उम्मीद का सीएम का सपना टूटता नजर आ रहा है, लेकिन इसका जिम्मेदार कौन है।

रणजी ट्रॉफी में क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड का लचर प्रदर्शन किसी से छिपा नहीं है। रणजी ट्रॉफी के पिछले सत्र में हीरो रही उत्तराखंड की टीम इस सत्र में जीरो साबित हुई। इसलिए अगले सत्र में उत्तराखंड की टीम फिर से प्लेट ग्रुप से खेलती नजर आएगी।

पिछले सत्र में उत्तराखंड टीम ने प्लेट ग्रुप से टॉप पर रहते हुए ग्रुप से क्वालीफाई करते हुए इलीट ग्रुप सी में जगह बनाई थी। इस सत्र में इलीट ग्रुप सी से खेलते हुए उत्तराखंड टीम का प्रदर्शन बेहद निराशजनक रहा है। उत्तराखंड को अभी तक खेले आठ मैचों में निराशा ही मिली है।

हर एक मैच में उत्तराखंड टीम ताश के पत्तों की तरह ढह गई। टीम में शामिल गेस्ट खिलाडिय़ों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। जिसके चलते टीम चयन प्रक्रिया व टीम प्रबंधन सवालों के घेरे में है। लेकिन जिम्मेदार मौन हैं और उत्तराखंड के खेल प्रेमी निराश।

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