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अपने संरक्षण की राह देख रहीं कुमाऊं की ऐतिहासिक धरोहरें

अल्मोड़ा: उत्तराखंड अपनी संस्कृति, परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए जाना जाता है। बावजूद इसके तमाम ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें हैं जो सामने नहीं आ पाई हैं। ऐसी धरोहरों को आज संरक्षण की दरकार है। हाल यह है कि संरक्षण के लिए राज्य और केंद्र सरकार की सूची में शुमार होने के बाद भी तमाम धरोहरों के प्रसार और संरक्षण की दिशा में कुछ खास काम नहीं हो पाया है।

कत्यूरी, चंद, गोरखा, अंग्रेज शासकों ने यहां कई साल राज किया। हिंदू ग्रंथों में केदारखंड और मानस खंड के रूप में कुमाऊं और गढ़वाल के पौराणिक इतिहास के बारे में स्पष्ट उल्लेख है।

कुमाऊं पौराणिक इतिहास को अलग-अलग स्वरूपों में समेटे हुए हैं। पुराने पांडवकालीन व ऐतिहासिक मंदिर, शिलालेख, इंडो यूरोपियन शैली में बने भवनों के अलावा तमाम ऐसी धरोहरें हैं जो संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रही है।

कुछ मुख्य धरोहरों के अलावा तमाम अन्य ऐसी गुमनाम धरोहर हैं जो यहां के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

कुमाऊं के चार जिलों में अनेक पुरानी ऐतिहासिक धरोहरें आज भी पुरातत्व विभाग की संरक्षण सूची में शामिल नहीं हो पाई है। इसमें अल्मोड़ा जिले में मुक्तेश्वर महादेव मंदिर कनरा, पवनेश्वर मंदिर पुभाऊं, प्राचीन शिलालेख कसारदेवी, बोडसी देवालय बाड़ेछीना, ल्वेटा रॉक पेंटिग, बद्रीनाथ मंदिर छत्तगुल्ला, मणिकेश्वर मंदिर,  चूड़ाकर्म महादेव मंदिर मासी।

बागेश्वर जिले के ऐड़ी देवालय, टोटा देवालय, शिव मंदिर मोहली, धौभिणा बिरखम आदि। चंपावत जिले में शिव मंदिर मजपीपल, सूर्य मंदिर मण संरक्षण की सूची में शामिल हैं। जबकि पिथौरागढ़ के विष्णु मंदिर कोटली को पिछले साल ही भारत सरकार को स्थानांतरित किया गया है।

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